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‘गिरिराज’ से बुंदेलखंड में होगा सरसों का राज
सब हेड: बुंदेलखंड के लिए राई एवं सरसों अनुसंधान निदेशालय ने नई किस्में की विकसित
- कृषि विश्वविद्यालय ने 75 किसानों से करवाई सरसों की बुवाई
- पिछले साल की किस्मों से 40 फीसदी तक ज्यादा हुई पैदावार
प्रशांत शर्मा
झांसी।
राजस्थान में सरसों की नई किस्म ‘गिरिराज’ के अच्छे परिणाम आने के बाद बुंदेलखंड को भी सरसों का हब बनाने की तैयारी है। भरतपुर के राई एवं सरसों अनुसंधान निदेशालय ने रानी लक्ष्मीबाई कृषि विश्वविद्यालय को ‘गिरिराज’ समेत चार उन्नत किस्मों के बीज उपलब्ध कराए हैं। 75 किसानों को यह बीज बुवाई के लिए दे दिए गए हैं। कृषि विश्वविद्यालय ने 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज होने की संभावना जताई है।
देश में 50 फीसदी सरसों का तेल राजस्थान उपलब्ध कराता है। पानी की कमी और अनियमित बारिश के कारण बुंदेलखंड की परिस्थिति राजस्थान के समान है। ऐसे में कृषि विश्वविद्यालय ने पिछले साल 40 किसानों के लिए भरतपुर के राई एवं सरसों अनुसंधान निदेशालय से सरसों की उन्नत किस्म के बीच मंगवाए गए थे। इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। पिछले साल बुवाई के बाद 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक यानी 30 से 40 फीसदी ज्यादा सरसों की पैदावर हुई। इसकी रिपोर्ट निदेशालय को भेजी गई। परिणाम से गदगद निदेशालय ने इस बार भी बुंदेलखंड के टीकमगढ़ (मध्यप्रदेश) के निवाड़ी, ओरछा ब्लॉक और झांसी के बड़ागांव, बबीना ब्लॉक के 75 किसानों के लिए सरसों की उन्नत प्रजातियों जैसे गिरिराज, भारत सरसों-1, आरएच-406, एनआरसीडीआर-2 के बीज कृषि विश्वविद्यालय को दिए हैं। विश्वविद्यालय ने डेढ़ किलो बीज प्रति एकड़ और 40 किलो खाद प्रति एकड़ की दर से इन्हें बांटा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस बार 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक सरसों की उपज होने की संभावना जताई है। फसल की बुवाई से कटाई तक सारे कार्य कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और शिक्षकों की देखरेख में होंगे। बुंदेलखंड की प्रतिकूल परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ये उन्नत प्रजातियां सरसों अनुसंधान निदेशालय ने विकसित की गई हैं। स्थानीय प्रजातियों की तुलना में इनकी उत्पादकता डेढ़ गुना है। इन प्रजातियों के बीज विश्वविद्यालय में 70 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध हैं।
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कम लागत, कम मेहनत और ज्यादा मुनाफा
बुंदेलखंड में गेहूं की बुवाई अधिक होती है। जबकि, गेहूं की फसल को चार या उससे अधिक बार पानी देना पड़ता है। वहीं, सरसों की फसल को 30 दिन में सिर्फ एक बार पानी की जरूरत होती है। इसकी फसल एक या दो बार पानी देने पर लहलहा उठती है। कृषि विश्वविद्यालय के अधिकारियों का कहना है कि ऐसे में यदि किसान गेहूं की जगह सरसों की बुवाई करेंगे, तो कम लागत, कम मेहनत में ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं। इस साल बारिश कम होने के चलते भी सरसों की बुवाई करना ठीक रहेगा। यह समय बुवाई के लिए उपयुक्त है।
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नई किस्म में फली और दाने अधिक
अभी बुंदेलखंड के किसान सरसों की सालों पुरानी लोकल किस्म के बीज की बुवाई करते हैं। यह शुद्ध नहीं होते हैं, ऐसे में कीट भी फसल में लग जाते हैं। वहीं, सरसों की नई किस्म शुद्ध होने से फसल में फली ज्यादा आती है और इसके दाने भी भारी होते हैं। फसल में रोग नहीं लगता है और तेल ज्यादा निकलता है।
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25 क्विंटल उपज है लक्ष्य
गिरिराज समेत चार उन्नत किस्में राई एवं सरसों अनुसंधान निदेशालय से मिली हैं। मौजूदा समय सरसों की बुवाई के लिए उपयुक्त है। इसलिए 75 किसानों को बुवाई के लिए बीज दे दिए गए हैं। इस साल 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज का लक्ष्य है। बुंदेलखंड के किसानों को गेहूं की जगह कम पानी की सरसों की फसल की बुवाई ज्यादा करनी चाहिए। संगठित होकर तेल मिल भी विकसित की जा सकती है। - प्रो. अरविंद कुमार, कुलपति, कृषि विश्वविद्यालय।