गुमनाम शहीदों को नमन करना उनकी जिंदगी का मकसद बन चुका है। सरदार धरम सिंह प्रतिदिन सुबह अपनी बेटी मंजीत कौर के साथ घर से निकल जाते हैं। किसी स्कूल या कालेज में पहुंच कर प्रार्थना के बाद बच्चों को शहीदों के
बारे में बताना और मोमबत्ती जलाकर शहीदों को श्रद्धांजलि देना उनका शगल है। 74 वर्षीय सरदार धरम सिंह और उनकी बेटी मंजीत कौर की दिन की शुरुआत भी शहीदों को नमन करने के साथ होती है। उनके पास 1360 शहीदों की
फेहरिस्त है जिनका वे बलिदान दिवस मनाते हैं। पवारा थाना क्षेत्र के मुरादपुर गांव निवासी सरदार धरम सिंह के परिवार में बेटी मंजीत कौर के अलावा कोई तीसरा सदस्य नहीं है। 1980 में फिरोजशाह कोटला मैदान नई दिल्ली में
हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का गठन करने के बाद से धरम सिंह इसी अभियान में जुट गए हैं। अब उनकी बेटी मंजीत भी पिता के अभियान को आगे बढ़ा रही हैं। मंजीत कहती हैं कि खुदी राम बोस के साथ सात लोगों को फांसी
दी गई थी लेकिन बाकी शहीदों के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। 11 जून 1857 को इलाहाबाद चौक पर 863 लोगों को फांसी दी गई थी उन शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए हर साल 12 जून को वे इलाहाबाद में बलिदान
स्थल पर जाते हैं। इसी दिन फतेहपुर में जोधा सिंह और उनके 52 साथियों को इमली के पेड़ में लटकाकर फांसी दी गई थी।