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सेवा और समर्पण से इस शिक्षक ने बनाई पहचान तो मिला राष्ट्रपति सम्मान

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जौनपुर। जलालपुर विकास खंड के पूर्व माध्यमिक विद्यालय रामपुर सोइरी से 31 मार्च 2017 में ही सेवानिवृत्त मोहम्मद असलम उसके बाद घर भी बाबू बैजनाथ प्रसाद शिक्षण प्रशिक्षण संस्थान जाते हैं। वहां से एक रुपया नहीं लेते लेकिन छात्रों को तालीम की रौशनी से जगमग कर रहे हैं। कोरोना संक्रमण के चलते स्कूल बंद हैं लेकिन उनके जुनून में कमी नही आई है। वह किसी न किसी बस्ती में जाते हैं और बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका कहना है कि कुछ देर पढ़ा न लूं तो सुकून नहीं मिलता।
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मोहम्मद असलम 19 फरवरी 1973 में बेसिक शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक बने। उन्होंने निष्ठा और सेवाभाव से पढ़ाना शुरू किया। इसका परिणाम रहा कि वर्ष 2014 में उनका चयन राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए हुआ। शिक्षक दिवस के मौके पर पांच सितंबर 2014 उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सम्मानित किया। मोहम्मद असलम तमाम शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका कहना है कि छात्रों को हमेशा शिक्षा के लिए प्रेरित करना ही उनकी जिंदगी का मकसद है। कोरोना शिक्षक और छात्रों के सामने एक नई चुनौती के रूप में है। हमें इस चुनौती का मुकाबला करना होगा। इसमें बच्चों के अभिभावकों को भी आगे आना होगा। वह कहते हैं कि भौतिकवादी इस युग में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि शिक्षक को राष्ट्र निर्माता की भूमिका निभाने की प्रेरणा कहां से प्राप्त होगी। जवाब में यही कहा जा सकता है कि प्राचीन काल से ही भारत में शिक्षक का स्थान ऊंचा था। वह शिक्षा का प्रसार भी करता था और समाज को भी संवारता था। अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से यह भाव कम हुआ है लेकिन समाप्त नहीं हुआ। हमारे यहां राष्ट्र निर्माता शिक्षकों की एक शृंखला रही हैं, जिनसे हमे प्रेरणा मिलती है।
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