साहित्यिक संस्था कोशिश की मासिक काव्य गोष्ठी बाबू रामेश्वर प्रसाद सिंह सभागार रासमंडल में व्यंग्यकार सभाजीत द्विवेदी प्रखर की अध्यक्षता में हुई। इसमें वार्षिक समारोह दो फरवरी को आयोजित करने का निर्णय लिया गया।
जनार्दन प्रसाद स्थाना ने कार्यक्रम की शुरुआत अपनी रचना जीवन नदिया की धार, कितनी इसकी रफ्तार... से की। गिरीश कुमार गिरीश के मुक्तक असंभव है कपट छल से सुख ना चैन पाओगे, निगल जाएगी दलदल हवस की गर डूब जाओगे... सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। रामजीत मिश्र का शेर तामीर हो गई दीवारें को सभी ने खूब सराहा। प्रो. आरएन सिंह की पंक्तियां अच्छे भले शरीफों को अब कोई नहीं पूछने वाला, ओछी हरकत करने वाला माननीय किरदार हो गया...से सामाजिक विसंगति पर चोट की।
अशोक मिश्र का दोहा सरसो शरमाई बहुत सुन गेहूं की बात, चलो वसंती हम करें जल्दी फेरे सात... ने प्रकृति का मनोरम चित्र खींचा। राजेश पांडेय की रचना काहे कंगना गढ़ाए न भाए अंगना ने दांपत्य के नोकझोंक की बानगी पेश की। अनिल उपाध्याय की क्षणिका पारा लुढ़का, जाड़े का है योग, ठंड से बचने के लिए करें अजवाइन का प्रयोग... सुनाया।
नंदलाल समीर का शेर पहले रहते थे कच्चे घरों में लोग लेकिन बात बचन के पक्के होते थे... से बदलते परिवेश पर कटाक्ष किया। फूलचंद भारती और आलोक रंजन सिन्हा की रचना भी खूब पसंद आई। विशिष्ट अतिथि जेब्रा अध्यक्ष संजय सेठ रहे। संचालन अशोक मिश्र और धन्यवाद ज्ञापन डाॅ. विमला सिंह ने किया।