गौरा गांव में पेड़ से बेर तोड़ता व्यापारी। संवाद
बदलापुर (जौनपुर)। अपनी बेमिसाल मिठास के लिए पूर्वांचल की मंडियों में धाक जमाने वाली गौरा की बेर अब सरकारी उपेक्षा और मौसम की मार के चलते दम तोड़ रही है। कभी गोमती तट के किनारे सैकड़ों एकड़ में लहलहाने वाले बेर और अमरूद के बाग अब सिमटकर चंद पेड़ों तक रह गए हैं। यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो यह मशहूर बागवानी सिर्फ यादों का हिस्सा बनकर रह जाएगी। मुख्यालय से 14 किमी दूर गौरा, गजेंद्रपुर और भेलूपुर गांव पिछले पांच दशकों से फलों की खेती के केंद्र रहे हैं। नदी किनारे की उपजाऊ जमीन पर किसान बड़े पैमाने पर अमरूद और बेर उगाते थे, जो उनकी आजीविका का मुख्य आधार था लेकिन लगातार कम होती बारिश और प्रशासन की बेरुखी ने अमरूद के बागों को लगभग खत्म कर दिया है। वहीं बेर के पेड़ भी अब गिनती के ही बचे हैं। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि यहां की बेर की मांग पूरे पूर्वांचल में रहती थी। महाशिवरात्रि के आसपास जब बेर पककर तैयार होते थे, तो मंडियों के भाव इन्हीं की आवक से तय होते थे। व्यापारी लालमणि और चंद्रशेखर के अनुसार, बागवानी घटने से अब न केवल किसानों का मुनाफा घटा है, बल्कि इस धंधे से जुड़े मजदूरों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। लोग अब मजबूरी में इस पुश्तैनी काम को छोड़ दूसरे पेशों की ओर रुख कर रहे हैं।