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पूविवि : कागजों में बढ़े आंकड़े खजाने पर पड़ा करोड़ों का बोझ

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करंजाकला। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय में किताब खरीद फरोख्त का मामला अब गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों में बदलता नजर आ रहा है। हर रोज नए खुलासे हो रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने तत्कालीन स्वामी विवेकानंद केंद्रीय पुस्तकालय के अध्यक्ष प्रो. मानस पांडे को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए सात दिन के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि तय समय में संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर राज्यपाल सचिवालय को पूरी जानकारी भेजी जाएगी। विश्वविद्यालय की आंतरिक जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि जिन पुस्तकों की मांग शिक्षकों ने की थी, उनकी जगह मनमानी ढंग से अन्य किताबों की खरीद कर ली गई। यह खरीद न केवल नियमों के विपरीत बताई गई है बल्कि इसमें जरूरत, छात्र संख्या और बजट संतुलन जैसे अहम मानकों की भी अनदेखी की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुस्तक खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और आवश्यकता का सिद्धांत पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया। सबसे बड़ा खुलासा व्यावहारिक मनोविज्ञान विभाग से जुड़ा सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 से 2022 के बीच इस पाठ्यक्रम में प्रतिवर्ष औसतन 30 से 35 छात्रों का ही प्रवेश होता था और यह दो वर्षीय कार्यक्रम था। इसके बावजूद केवल इसी विभाग के लिए जर्नल और रिसोर्स के नाम पर 1 करोड़ 60 लाख 64 हजार 601 रुपये की किताबें खरीद ली गईं। यह खरीद न केवल छात्र संख्या बल्कि विभाग की आय के अनुपात में भी कई गुना अधिक पाई गई, जिससे पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इसी तरह विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग संस्थान के गणित विभाग में भी अनियमितता उजागर हुई है। विभागाध्यक्ष ने बुक बैंक के लिए बीटेक प्रथम सेमेस्टर के छात्रों के लिए एस. चंद प्रकाशन की इंजीनियरिंग मैथमेटिक्स पुस्तक की 250 प्रतियों की संस्तुति की थी लेकिन दस्तावेजों में ओवरराइटिंग कर 350 प्रतियां खरीद ली गईं। इन पुस्तकों को आवश्यकता से अधिक और ऊंची दर पर खरीदा गया। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पुस्तक खरीद की प्रक्रिया में वास्तविक आवश्यकता, बजट संतुलन, पाठ्यक्रम की मांग और छात्र संख्या जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की पूरी तरह उपेक्षा की गई। जिन पुस्तकों की जरूरत सीमित थी, उनकी भी बड़ी संख्या में खरीद कर दी गई। प्रशासन को आशंका है कि यह गड़बड़ी केवल एक या दो विभागों तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य विभागों में भी ऐसे ही मामले सामने आ सकते हैं यदि निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए। अब विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से नोटिस जारी होने के बाद पूरे मामले में हलचल तेज हो गई है। प्रोफेसर मानस पांडे को निर्धारित समय में संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, तो यह मामला सीधे उच्च स्तर की जांच और विधिक कार्रवाई की ओर बढ़ सकता है। इससे विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और वित्तीय पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
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