कभी साइकल की घंटी बजाते खाकी वर्दी और खाकी टोपी पहने जब गांव की पगडंडियों पर डाकिया निकलता था तो सभी घरों के दरवाजे खुल जाते थे। बच्चे-बूढे हर किसी की जुबान पर होता था डाकिया आया डाक लाया। पर अब न तो लोगों को चिट्ठी का इंतजार रहता है और न ही किसी अचानक आ जाने वाली सूचना का। क्योंकि अब गांव-गांव घर-घर मोबाइल की घंटी घनघनाने लगी है।
मोबाइल क्रांति के बाद इलेक्ट्रानिक माध्यमों की आंधी में डाक घरों के पोस्टकार्ड, अंतरदेशी, मनीआर्डर, तार, वीपीपी और लेटर बाक्स जैसी कई व्यवस्थाओं की जरूरत ही नही रह गई है। दशकों तक घर-घर चिट्ठी पत्री पहुंचाने वाले डाकिए त्वरित बदलाव न होने के कारण अब मूल राह से भटक गए हैं। डाक घरों को हाई टेक करने के कई फरमान आला अधिकारियों ने जारी किए, लेकिन वे आर्थिक संकट और कर्मियों की शिथिलता की भेंट चढ़ गई। जनपद में एक मुख्य डाकघर, 53 उप डाकघर और 374 ग्रामीण डाकघर हैं। इसमें मात्र 15 डाकघर ही सीबीएस प्रणाली से लैस हो सका है। सूत्रों की माने तो जनपद में स्टाफ की भारी कमी है। इस कारण कार्यों में बाधा आती है। पत्र व्यवहार में कमी आने के कारण लेटर बाक्स जंग खाकर गुम हो चुके हैं।
जनपद के 21 उप डाकघरों को कोर बैकिंग सोल्यूशन (सीबीएस) से जोड़ना है, लेकिन अभी तक सिर्फ पंद्रह ही सीबीएस प्रणाली से जुड़ सका है। जिले में अलफस्टिनगंज स्थित प्रधान डाकघर, कचहरी, खेतासराय, जलालपुर, शाहगंज डाकघर विभाग का है। बाकी सभी 423 पोस्ट आफिस किराए पर है। जिले को व्यवस्था के तहत 43 पिन कोड में बांटा गया है। प्रधान डाकघर और कचहरी उप डाकघर में आठ-आठ कर्मी हैं। बाकी डाकघरों में एक कर्मचारी से ही काम चलाया जा रहा है। स्टाफ की कमी से विभागीय कार्यों के क्रियांवयन में काफी दिक्कत होती है। डाक दिवस पर यहां पेंटिंग प्रतियोगिता होती थी लेकिन इस बार सीधे दिल्ली डाकघर पेंटिंग अपने यहां मंगवा रहा है।