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मानक 15 बंदियों पर एक बंदीरक्षक का, यहां सौ पर एक

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जिला जेल के अंदर सुरक्षा व्यवस्था बस भगवान भरोसे ही है। यहां बंदी-कैदी तो क्षमता से चार गुना हैं, लेकिन जेल की सुरक्षा करने वालों की संख्या सृजित पदों से भी कम है। जेल के मानक के तहत 14-15 बंदियों-कैदियों पर एक बंदीरक्षक की तैनाती होनी चाहिए, जबकि यहां 100 पर एक बंदीरक्षक की तैनाती है। डेढ़ सौ वर्ष पुरानी जेल में न तो मजबूत दीवारें हैं और न ही कोई वाच टॉवर। हत्या, लूट, डकैती जैसी वारदातों में शामिल बदमाशों और शातिरों से भरी इस जेल में सुरक्षा करना जेल और जिला प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती से कम नहीं है।
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जौनपुर जेल की स्थापना 1870 में हुई थी। तब बैरक भी छोटे-छोटे थे और बाहरी दीवारों की ऊंचाई भी अधिक नहीं रखी गई थी। इस जेल की क्षमता 320 बंदियों की है। इसी आधार पर बंदी रक्षकों और मुख्य बंदी रक्षकों के पद सृजित किए गए हैं। क्षमता के अनुसार ही व्यवस्थाएं रही तो जेल सुरक्षित भी है और यहां व्यवस्थाएं भी सुव्यवस्थित संचालित होंगी। इससे इतर यहां बंदी तो चार गुना रखे गए हैं, जबकि बंदी रक्षकों की संख्या आधी ही है। इन्हीं में से संतरी और बाहर गेट पर जांच करने वालों की भी ड्यूटी लगाई जानी है और बैरकों के सुरक्षा की भी। कोरोना काल में 119 बंदियों को अंतरिम जमानत और पेरोल पर छोड़ने के बाद जिला जेल में फिलहाल 1070 बंदी हैं।
दूसरी ओर 58 बंदी रक्षकों के सापेक्ष 29 की तैनाती है। आठ मुख्य आरक्षी के पद हैं, जिन पर 14 सेवा दे रहे हैं। इन्हीं सुरक्षाकर्मियों से आठ-आठ घंटे की तीन शिफ्ट में ड्यूटी लगती है। इस लिहाज से देखें तो एक समय में दस बंदी रक्षक ही ड्यूटी पर होते हैं, जो एक हजार से अधिक बंदियों को संभालने का जिम्मा उठाते हैं। इन्हीं में से किसी को संतरी बनाया जाता है तो किसी गेट के अंदर प्रवेश पर जांच का जिम्मा दिया जाता है। इस बाबत जेल अधीक्षक एसके पांडेय का कहना है कि कुद्दुपुर के पास नई जेल का निर्माण प्रस्तावित है। वहां आधुनिक व्यवस्था होगी। इसके लिए धनराशि आ चुकी है। जमीन का बैनामा भी शुरू हो चुका है। बंदीरक्षकों की संख्या बढ़ाने के बारे में निरंतर पत्राचार किया जा रहा है।
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जिला जेल में उपद्रव ठीक उसी दिन हुआ, जब जेल में बंद पांच शातिर बंदियों के जेल बदलने का प्रस्ताव तैयार हो रहा था। यह बंदी कई वर्षों से इसी जेल में हैं। जेल बदलने का प्रस्ताव आगे बढ़ता, इससे पहले ही कैदी बागेश मिश्र की मौत हो गई और फिर उपद्रव शुरू हो गया। जेल प्रशासन और जांच अधिकारी इसे सिर्फ संयोग नहीं मान रहे। लिहाजा उपद्रव के पीछे इस साजिश के पहलू से भी जांच हो रही है।
अति संवेदनशील जेल में श्रमजीवी एक्सप्रेस विस्फोट कांड में शामिल आतंकी, कई कुख्यात और शातिर बदमाश बंद हैं। वर्षों से यहां होने के कारण कुछ शातिर बदमाशों ने जेल की सुरक्षा में लगे बंदीरक्षकों से सांठ-गांठ कर ली है। बंदीरक्षक उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं। बदले में शातिर बदमाश उन्हें जेल के बाहर सुविधाएं मुहैया कराते हैं। इस सांठ-गांठ के चलते ही इन बंदियों को मनचाही वस्तु जेल में आसानी से उपलब्ध हो गई। जेल के अधिकारियों को इसकी भनक लगी तो उन्होंने इसे गंभीरता से लेते हुए कड़े कदम उठाने की तैयारी कर दी। इसी के तहत लंबे समय से जमे पांच शातिरों की जेल बदलने की प्रक्रिया थी। जिस दिन इसका प्रस्ताव तैयार हो रहा था, उसी के अगले दिन जेल में उपद्रव हो गया। उपद्रवियों ने वार्ता के दौरान अफसरों से किसी की भी जेल न बदलने की मांग रखी है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस उपद्रव के पीछे भी उस शातिर बदमाशों की साजिश तो नहीं। इसकी पड़ताल के लिए जेल प्रशासन अंदर छिपे विभिषणों की पहचान में भी जुट गया है।
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