काशी धर्मपीठाधीश्वर जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महराज ने कहा कि संसार में कोई शक्ति धर्म से ऊपर नहीं है। धर्म से पूरे समाज का विकास होता है।
श्रीमद्भागवत में बताता गया है कि धर्म की रक्षा सदैव करनी चाहिए। इसकी रक्षा से समृद्धि आती है। सतकृत्य का दूसरा नाम यज्ञ है। 100 यज्ञों को करने वाला इन्द्र है। इन्द्र का एक नाम सतकृ त्यु भी है।
सत यानी सौ और कृत्यु यानी यज्ञ होता है। अगर जीवन में नियम नहीं तो वह बिना ब्रेक के गाड़ी के समान होता है। बिना ब्रेक के गाड़ी पर चढ़ना किसी को अच्छा नहीं लगता।
इसलिए धर्म के द्वारा जीवन रूपी गाड़ी को नियंत्रित करना चाहिए। वह जमालापुर पट्टी के दुर्गा मन्दिर पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा व ज्ञान गंगा में प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि यज्ञ बिना दक्षिणा के नहीं करना चाहिए। भजन, कीर्तन, ध्यान एवं धर्म करने वाले को क्त्रसेध नहीं करना चाहिए। क्रोध करने से किसी भी यज्ञ का फल नहीं मिलता। यज्ञ आनन्द ब्रह्म रूपी रस है।
यज्ञ करने से अमृत की प्राप्ति यानी ईश्वर की प्राप्ति होती है। यज्ञ से मिलने वाला फल सोमरस होता है जो सभी दु:खों का नाश करता है। झूठ बोलने से धर्म व कर्म दोनों का नाश होता है।
धर्म के लिए निकाले गए धन को दूसरी जगह खर्च करने से प्रलय आता है। इसलिए यज्ञ करने वाले लोग श्रेष्ठ होते है। जीवन में निन्दा किसी की नहीं करनी चाहिए। निन्दा करने से कोई भी उंचे स्थानों पर नहीं जाता है।
जैसे झूठी गवाही देकर कोई भी प्राणी आगे नहीं बढ़ सकता, उसी प्रकार निन्दा करने से आदमी नीचे जाता है। मनुष्यता एंव मानवता बचाना है तो धर्म को ध्यान रखना है।
वोट देने का अधिकार सभी को है लेकिन किसी की निन्दा करके वोट लेना धर्म नहीं है। जीवन क्षमा धर्म है। जहां क्षमा नहीं वहां धर्म नही। इस अवसर पर राघोराम सिंह, भीमसेन सिंह, डब्बू सिंह, विनय सिंह सुशील सिंह, सुजीत सिंह आदि श्रद्धालु उपस्थित रहे।