राइस मिलों की मनमानी का खामियाजा किसान भुगत रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2011-12 और 2012-13 का करीब तीन करोड़ का चावल राइस मिलरों ने नहीं लौटाया। जिसका नतीजा है कि इस साल पीसीएफ ने अभी तक धान क्रय केंद्रों को पैसा ही नहीं दिया। धान पैदा करने वाले किसान परेशान हैं।
एक तो नोटबंदी दूसरे धान की खरीद न होने से परेशान किसान अब अपनी गाढ़ी कमाई को खुले बाजार में कम रेट पर बेचने को विवश हो रहे हैं। जिले में धान खरीद के लिए कुल 86 केंद्र खोले गए हैं। इसमें सबसे अधिक 56 केंद्र पीसीएफ के हैं बाकी अन्य एजेंसियों के।
यूपी एग्रो, कर्मचारी कल्याण निगम, भारतीय खाद्य निगम, किसान प्रतियात्मक समिति समेत अन्य एजेंसियों के 30 केंद्रों पर खरीद तो शुरू कर दी गई पर पीएसएफ के किसी भी केंद्र पर खरीद नहीं शुरू हुई। जबकि एक नवंबर से ही किसानों से धान खरीदने का आदेश शासन ने जारी किया है।
शासन के निर्देश पर संबंधित केंद्रों पर समर्थन मूल्य का बोर्ड और कांटा तो लग गया है पर किसान वहां धान लेकर जा रहे तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया जा रहा कि अभी उन्हें ऊपर से पैसे ही नहीं दिए गए। बक्शा के किसान दयाराम यादव कहते हैं कि एक तो सरकार ने हजार और पांच सौ के नोट बंद कर दिए दूसरे धान की खरीद भी नहीं हो रही।
आगे की खेती के लिए पैसे चाहिए। इस नाते अब खुले बाजार में ही धान बेचना मजबूरी है। इस बार सरकार ने धान खरीद के लिए 1470 रुपये समर्थन मूल्या घोषित किया है लेकिनि बाजार में किसान एक हजार से 1200 रुपये में ही धान बेचने को मजबूर हो गए हैं।
करंजाकला के किसान राजदेव यादव और खुटहन के रामआसरे का भी यही रोना है। किसानों का कहना है कि जब किसान बाजार में कम दाम पर अपनी फसल को बेच देंगे तो बड़े व्यापारियों से ही सांठगांठ कर क्रय केंद्रों पर उनसे धान खरीद लिया जाएगा।