बरसठी। कथा वाचक प्रभाकर महाराज ने कहा कि मनुष्य स्वयं को भगवान बनाने के बजाय प्रभु का दास बनने का प्रयास करें। भक्ति भाव देख कर जब प्रभु में वात्सल्य जागता है तो वे सब कुछ छोड़ कर अपने भक्तरूपी संतान के पास दौड़े चले आते हैं। वह खुआवा गांव में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के समापन पर भक्तों के बीच प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है। जब कि संत सद्भाव में जीता है। श्रीकृष्ण भक्त एवं बाल सखा सुदामा के चरित्र का वर्णन, श्रीमद्भागवत तथा श्रीव्यास पूजन किया। श्रीकृष्ण एवं सुदामा की मित्रता का बड़े ही मनोरम तरीके से वर्णन किया। कथा व्यास ने कहा कि, कहा कि ‘स्व दामा यस्य स: सुदामा’ अर्थात जो अपनी इंद्रियों का दमन कर ले वही सुदामा है। सुदामा की मित्रता भगवान के साथ नि:स्वार्थ थी। उन्होंने कभी उनसे सुख साधन या आर्थिक लाभ प्राप्त करने की कामना नहीं की। अगले प्रसंग में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिन तक श्रीमद्भागवत कथा सुनाई, जिससे उनके मन से मृत्यु का भय निकल गया। तक्षक नाग आता है और राजा परीक्षित को डस लेता है। राजा परीक्षित कथा श्रवण करने के कारण भगवान के परमधाम को पहुंच गए। कथा के मुख्य यजमान सरोजा देवी पत्नी चंद्रकेश शुक्ला रहे। इस मौके पर राजेन्द्र शुक्ल, परीक्षित शुक्ला,वंशनरायन शुक्ला, सुरेंद्र शुक्ला, श्रवण शुक्ला आदि मौजूद रहे।