मछलीशहर। ब्लाॅक के गांवों में बने अधिकतर सामुदायिक शौचालयों का छोटी-छोटी कमियों के चलते उपयोग नहीं हो पा रहा है। इसको संचालित करने वाले समूह के सदस्य ताला लगाकर गायब हैं। जबकि प्रतिमाह नौ हजार रुपये मानदेय का भुगतान ग्राम पंचायतों से किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा कि जब शौचालयों का उपयोग ही नहीं हो रहा तो रुपये कहां जा रहे।
गांव में खुले में शौच करने की परंपरा को समाप्त करने के लिए सरकार द्वारा सामुदायिक शौचालय का निर्माण कराया गया है। बीते पंच वर्षीय योजना में करीब चार लाख की लागत से स्थानीय ब्लाक में 92 ग्राम पंचायतों में सामुदायिक शौचालय का निर्माण कराया गया। इन शौचालयों के संचालन की जिम्मेदारी स्वयं सहायता समूहों को दी गई। जबकि रख-रखाव की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान को दी गई। इसके लिए समूह के खाते में प्रतिमाह छह हजार रुपये मानदेय दिया जाता है। वहीं शौचालय के रख-रखाव व मरम्मत के लिए ग्राम प्रधान को तीन हजार रुपये प्रतिमाह दिया जाता हैं। प्रधान इस धनराशि से साबुन, तौलिया आदि भी खरीदते हैं। वर्तमान में गांवों के अधिकतर शौचालय निष्प्रयोज्य ही साबित हो रहे हैं। किसी का दरवाजा टूटा है तो किसी में पानी व्यवस्था ही नहीं है और कुछ जगह शौचालय में सामान रखकर ताला बंदकर समूह के सदस्य गायब हैं। जबकि ग्राम पंचायत से निर्धारित धनराशि का भुगतान लगातार किया जा रहा है। इसमें छाछों गांव के शौचालय में सामान अंदर रखकर ताला बंद किया गया है। साहिजदपुर गांव में सामुदायिक शौचालय का दरवाजा व पाइप टूटी है। खजुरहट गांव में टूटा दरवाजा व शौचालय क्षतिग्रस्त है।
मामला संज्ञान में आया है। सामुदायिक शौचालयों का संचालन क्यों नहीं हो रहा इसकी जांच कराई जाएगी। दोषियों पर कड़ी की जाएगी।- राम निहाेर, एडीओ पंचायत मछलीशहर।