मानसून ने दस्तक दे दिया है, लेकिन प्रशासन की बाढ़ से निबटने की तैयारी अधूरी है। न तो अभी कंट्रोल रूम खोले गए हैं और न ही बाढ़ चौकी खोलने का काम ही शुरू हुआ है। जबकि नदियों का जल स्तर दिनों दिन बढ़ रहा है। जब गंगा में बाढ़ आती है तो उसका असर गोमती पर भी पड़ता है।
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वैसे तो प्रशासन बाढ़ से निबटने का दावा कर रहा है, लेकिन पूरी तैयारियां कागजों में ही सिमट कर रह गई हैं।जिले में गोमती, सई, वरुणा, पीली व बसुई नदी है। जिससे जिले में बाढ़ आने की संभावना प्रबल रहती है। इन नदियों में बाढ़ आने से जिले के 239 गांवों प्रभावित होते हैं।
वहीं लगभग 940 हेक्टेयर भूमि जल प्लावित होती है। सबसे अधिक इलाका गोमती नदी में बाढ़ आने से प्रभावित होता है। गोमती में बाढ़ आने से लगभग जिले का दो तिहाई भाग जल प्लावित हो जाता है। हालांकि 1985 के बाद जिले के लोगों को बाढ़ की विभीषिका नहीं झेलनी पड़ी।
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उधर मानसून आ जाने के कारण जिला प्रशासन बाढ़ से निबटने की तैयारी में जरूर लगा है लेकिन अभी भी तैयारियां आधी अधूरी हैं। कंट्रोल रूम खोलने के लिए स्थान का चयन किया जा चुका है। बाढ़ आने पर जिला मुख्यालय सहित तहसील स्तर पर कंट्रोल रुम खोला जाएगा।
147 छोटी नाव, 48 बड़ी नाव व 44 मझली नाव सहित दो बोट की व्यवस्था पूरी कर करने का दावा प्रशासन का है। 33 गोताखोरों का भी चयन कर लिया गया है। 44 बाढ़ चौकी भी बनाने के लिए स्थानों का चयन कर लिया गया है।