कभी एशिया के मत्स्य प्रक्षेत्रों में अपना वजूद रखने वाले जिले का गूजरताल नवंबर महीने का आखिरी सप्ताह आते ही मेहमान पक्षियों के कलरव से गुलजार हो उठता था।
पर दिसंबर महीने का भी पांच दिन गुजर गया लेकिन गूजर ताल सूना पड़ा है। जानकार मानते हैं कि पर्यावरण में परिवर्तन और शिकारियों की बर्बरता के चलते गूजरताल से भी मेहमान पक्षियों का मोह भंग हो रहा है। प्रशासन की ओर से भी इसके विकास के लिए कोई खास पहल नहीं हुई।
खेतासराय से तीन किलोमीटर दूर खुदौली गांव में 221.6 एकड़ में फैले जिले के इस विशाल मत्स्य प्रक्षेत्र गूजरताल में बड़ी तादात में प्रवासी पक्षी आते थे।
प्राकृतिक सौंदर्य को समेटे इस ताल को 157 में मत्स्य प्रक्षेत्र घोषित किया गया था। इस ताल में कभी ठंड के दस्तक देते ही विदेशी पक्षियों का अद्भुद कलरव सुनाई देने लगता था।
इसमें फ्रांस, रूस, टर्की समेत तमाम ध्रुवी देशों से कैमर, लहक्षन, टिकई, चैता, पिछार, साइबेरियन, बगुला आदि पक्षी यहां आते थे। इधर कई सालों से ठंड देर से शुरू हो रही है तो मेहमान परिंदे भी यहां देरी से ही पहुंचते हैं।
अभी तक गूजरताल सूना पड़ा है। प्रशासनिक उपेक्षा के चलते इन मेहमान परिंदों पर शिकारियों की नजर लग गई। इलाके के नौली, गोधना, महरौरा, रानीमऊ, मैनुद्दीनपुर, सैयद गोरारी आदि गांवों के लोग मेहमान परिंदों का खुलेआम शिकार करने लगे।
इस कारण भी मेहमान पक्षी इधर से मुह मोड़ चुके हैं। पिछले साल जनवरी के महीने में मेहमान पक्षी यहां आए जरूर थे पर उनकी संख्या पहले जैसी नहीं थी।
पर्यावरण विद् एवं पक्षियों के जानकार डा. अरविंद मिश्र कहते हैं कि मेहमान परिंदों के संरक्षण के लिए शिकारियों पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन की ओर से ठोस पहल की आवश्यकता है।
वह कहते हैं कि गूजरताल को विकसित कर उसे ईको पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है।