जौनपुर के सिकरारा इलाके में सई नदी का हाल ।
एक तरफ अंधाधुंध पानी के दोहन से धरती की कोख खाली हो रही है तो दूसरी ओर खेती और जंगल का दायरा भी तेजी से सिमट रहा है। उधर बढ़ती आबादी के कारण अन्न और जल की हमारी जरूरतें बढ़ रही हैं। हालात नहीं बदले तो आने वाले समय में हमें दाना और पानी के लिए भी तरसना होगा।
बढ़ते प्रदूषण, सूखती नदियां और खत्म होते जंगल धरती को बेजान बना देंगे। पृथ्वी दिवस के मौके पर ऐसे ही पहलुओं पर अमर उजाला ने पड़ताल की तो चौंकाने वाले तथ्य देखने को मिले।धरती का सीना चीरकर पानी बाहर निकालने के संसाधन तो तेजी से बढ़े, लेकिन धरती के अंदर पानी कैसे डाला जाए इसके लिए कोई सुधि नहीं ली गई।
बारिश का पानी धरती के अंदर डालकर जलस्तर के मेंटेन रखने के लिए वैज्ञानिकों की ओर से जो सुझाव और संसाधन बताए गए उस पर भी कोई अमल नहीं हुआ। नतीजा हर साल भूगर्भ जलस्तर 50 से 60 सेंटीमीटर नीचे खिसक रहा है। शहरीकरण के चलते खेती का दायरा भी तेजी से घट रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2000 में जिले में 291724 हेक्टेयर में खेती होती थी। वर्ष 2015 में खेती का यह दायरा सिमट कर 278948 हेक्टेयर हो गया। 15 सालों में 12776 हेक्टेयर खेती कम हो गई। जबकि आबादी में तकरीबन छह लाख से अधिक का इजाफा हुआ है। यह एक भयावह स्थिति है। यदि समय रहते लोग नहीं चेते तो परिणाम बेहद भयावह होंगे।