रोडवेज डिपो पर बसों का इंतजार यात्रियों पर भारी पड़ रहा है। धूप और धूल में हलकान होकर मुसाफिरों को घंटों बसों का इंतजार करना पड़ता है। बैठने की कौन कहे डिपो में उन्हें खड़े होने तक की जगह नहीं है। अभी यात्रियों को नौ महीने ऐसी ही मुसीबत झेलनी होगी। ऐसी स्थिति तब है जब विभिन्न डिपो की तकरीबन 300 बसें यहां से गुजरती हैं। जिसमें तकरीबन 10 हजार यात्री प्रतिदिन बसों से यात्रा करते हैं।
जौनपुर रोडवेज डिपो प्रदेश का ऐसा डिपो है जहां न तो बाथरूम है और न ही पेयजल का कोई मुकम्मल इंतजाम है। यहां जर्जर भवनों को ध्वस्त कर सितंबर 2015 से यूपीसीएल द्वारा नए भवन का निर्माण कराया जा रहा है। 3.16 करोड़ की लागत से बनने वाले रोडवेज भवन के निर्माण की गति काफी धीमी है। अभी तक सिर्फ पांच माह में नींव ही तैयार हो सकी है।
चारो तरफ करीब ढाई एकड़ परिसर में कहीं भी यात्रियों के खड़े होने तक की जगह नहीं है। चारो तरफ धूल, गिट्टी, बालू, मलबे पड़े हुए हैं। सुबह सात बजे से 10 बजे तक 30 की संख्या में बसें खड़ी रहती हैं। जबकि इससे अधिक संख्या में बसों का आना जाना लगा रहता है।
रोडवेज जौनपुर से 62 और 17 अनुबंधित 41 सीटर बसें संचालित होती हैं। जबकि प्रतापगढ़, वाराणसी, इलाहाबाद, गोरखपुर, चंदौली, सुल्तानपुर, अमेठी, आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ, रायबरेली, लखनऊ आदि डिपो की तकरीबन 300 बसों में सवार होकर यात्री आते जाते हैं। रोडवेज परिसर में बसों के खड़े होने की जगह न होने और धूल की वजह से खासकर इलाहाबाद और गोरखपुर की तरफ से आने वाली बसें जेसीज चौराहे से ही गुजर जाती हैं।
ज्यादेतर यात्री चौराहे पर ही घंटों खड़े होकर बसों का इंतजार करते हैं। अलबत्ता वाराणसी, लखनऊ आदि डिपो की बसें रोडवेज परिसर में जरूर आती हैं। खड़े होने की जगह न होने की वजह से रोडवेज के सामने अक्सर जाम लग जाता है। जिससे कचहरी जाने वाले लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है। जबकि लोगों की ट्रेन वगैरह भी छूट जाती है।