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छोटी उम्र के बड़े फैसलों ने समाज के सामने रखी नजीर

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सिकरारा में अपनी मां को पढ़ाती बेटी। संवाद - फोटो : JAUNPUR
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जौनपुर। बेटियों को परिवार का मान ऐसे ही नहीं कहा जाता। वह अपनों के लिए फिक्रमंद रहती हैं। अच्छे-बुरे की चिंता करती हैं। हर जिम्मेदारी को आगे बढ़कर उठाने और परिवार को आगे बढ़ाने का जज्बा रखती हैं। आज हम जौनपुर की ऐसी ही दो बेटियों की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने यह साबित किया कि वह बेटों से कम नहीं। उनके संकल्प, उनके संघर्ष और उनकी जीवटता जानकर आप भी उनके हौसलों को सराहे बिना नहीं रह पाएंगे। महज 12 साल की छोटी सी उम्र में ही बड़े फैसले लेकर उन्होंने समाज के लिए नजीर पेश की है। नजीर इसलिए भी कि वह चाहतीं तो हालात से समझौते कर लेतीं और चुपचाप बहती धारा के साथ चल पड़तीं, लेकिन उन्होंने न सिर्फ बदलाव का साहस जुटाया बल्कि इसे करके भी दिखाया। अपराजित होने वाली यह बेटियां ही तो मिशन शक्ति की पहचान हैं।
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निरक्षर थीं मां, बेटी के संकल्प ने बना दिया साक्षर
- अब अपना हस्ताक्षर बनाती हैं और पढ़ना भी जानती हैं मंजू यादव
- सिकरारा के कंपोजिट विद्यालय डीहजनिया की छात्रा रेशम पर मां को नाज
अमर उजाला ब्यूरो
जौनपुर। मां निरक्षर थीं। कागजात पर वह बस अंगूठा लगाती थी। उन्हें अक्षर का भी पता नहीं था। सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी के मन में इसकी टीस थी। उसने संकल्प उठाया कि मां को पढ़ना सिखाएगी। करीब एक वर्ष की कड़ी मेहनत और शुरुआती चुनौतियों के बाद उसने इसे पूरा करके दिखाया है। सिकरारा ब्लाक के कंपोजिट विद्यालय डीहजनिया की छात्रा रेशम यादव की इस पहल ने मां मंजू यादव की आंखों में नए सपने-नई उम्मीदें जगाई हैं। वह अब और पढ़ना चाहती हैं और आगे भी बढ़ना चाहती हैं।
रेशम यादव के पिता श्यामबली मुंबई में कपड़े की फैक्टी में काम करते हैं। घर पर मां-बेटी और बेटा राज (7) साथ रहते हैं। मंजू यादव की शुरू से ही पढ़ाई नहीं हुई। वह घर के कामकाज में ही रह गई। बेटी जब बड़ी हुई और पढ़ना शुरू किया तो उसे मां की यह पीड़ा खटकने लगी। वह अक्सर मां को हर जगह अंगूठा लगाते देखती तो मन में टीस उठती थी। इस टीस को मिटाने के लिए उसने मां से पढ़ने की विनती की। शुरू में तो मां ने इसे नजरंदाज करते हुए बेटी को टालने की कोशिश की, लेकिन जब बेटी ने जिद पकड़ ली तो उन्होंने 32 साल की उम्र में स्लेट और पेंसिल उठा लिया। करीब एक साल की मेहनत के बाद अब वह लिखना सीख गई है। अंगूठा लगाने की बजाय वह अब हर जगह अपना नाम ही लिखती हैं। हिंदी और अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर भी पढ़-लिख लेती हैं। मंजू यादव का कहना है कि बेटी ने उन्हें एक नया सपना दिखाया है। अब वह आगे भी पढ़ेंगी। इतना ज्ञान तो जरूर लेंगी कि कागज दिखाकर कभी कोई उनसे कुछ गलत न करा ले। अपनी बेटी पर उन्हें नाज है। वहीं रेशम का कहना है कि स्कूल की शिक्षक अमरावती देवी, गायत्री श्रीवास्तव, वंदना सिंह, दीपक, शिवम आदि हमेशा शिक्षा का महत्व बताते हुए उनसे गांव के अनपढ़ लोगों को पढ़ाने के लिए कहते थे। मां अनपढ़ थी, लिहाजा मैंने उनसे ही शुरुआत की। अब मां जब हस्ताक्षर करती हैं तो अच्छा लगता है।
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बेटी ने निभाया बेटे का फर्ज, पिता को दी मुखाग्नि
- रुढ़ियों को तोड़कर दिखाया समाज को आइना
अमर उजाला ब्यूरो
जौनपुर। शहर के रामघाट पर बुधवार को लोग एक नई शुरुआत के गवाह बने। सामाजिक रुढ़ियों को तोड़कर बेटी ने बेटे का फर्ज निभाया और दिवंगत पिता को मुखाग्नि दी। इस कठिन वक्त में उसका हौसला बढ़ाने के लिए कोई भी अपना पास नहीं था। फिर भी वह कर्तव्य पथ से डिगी नहीं। आंखों से बहती आंसूओं की धार के बीच उसने पिता की चिता को अग्नि दी तो हर कोई फफक पड़ा।
बगीचा उमरखान मोहल्ला (उर्दू बाजार) निवासी शिव कुमार साहू (35) हलवाई का काम करते थे। यही उनकी आजीविका का जरिया था। लंबे समय से बीमारी के कारण वह बिस्तर पर थे। मंगलवार की देर रात उन्होंने दम तोड़ दिया। पत्नी काफी पहले ही छोड़कर चली गई थी। पिता कामता साहू भी बीमार हैं और मुंबई में बेटियों के पास थे। घर पर शिवकुमार के अलावा मंदबुद्धि मां व बेटी मीरा (13) ही थीं। शिवकुमार की मौत के बाद से दोनों का रो-रोकर बुरा हाल था। उनके पास न तो अंतिम संस्कार के लिए पैसे थे और न ही कुछ सोचने-समझने की हिम्मत। पास-पड़ोस और मोहल्ले के लोगों ने पहल की तो कुछ पैसा एकत्रित कर अंतिम संस्कार के लिए सामान जुटाए। समस्या यह थी कि शिवकुमार की चिता को मुखाग्नि कौन दे। कोई बेटा नहीं था और पिता भी मुंबई में बीमार हाल में थे। उन्हें आने में दो से तीन दिन का समय लगता। तब तक शव को सुरक्षित रखना चुनौतीपूर्ण था। लोग जब तक कोई निर्णय ले पाते कि 13 वर्षीय बेटी मीरा आगे आई और खुद पिता का दाह संस्कार करने की बात कही। उसके इस फैसले से एकबारगी तो मोहल्ले के लोग सकते में आ गए, मगर फिर बेटी के हौसले को सराहते हुए शव श्मशान घाट ले गए। रामघाट पर सजी चिता को बेटी ने मुखाग्नि दी तो लोगों की आंखों में आंसू थे। हर कोई बेटी के साहस की सराहना कर रहा था। मोहल्ले के विशाल वर्मा, पवन मोदनवाल, गुड्डूू सेठ आदि ने बताया कि मीरा के कदम वाकई सराहनीय है। ऐसी बेटियां समाज के लिए नजीर हैं।

रामघाट पर पिता को मुखाग्नि देती बेटी मीरा साहू। संवाद- फोटो : JAUNPUR

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