शनिवार को नगर में एक्सिस बैंक के एटीएम से पैसा निकालने के लिए लगी भीड़।
महीने भर से रोज-रोज बैंकों पर लाइन लगाना अब लोगों की दिनचर्या में शुमार हो चुका है। तमाम घरों में रात में ही तय हो जाता है कि सुबह बैंक या एटीएम पर लाइन लगाने किसे जाना है। नोटबंदी के महीने भर बाद भी बैंक और एटीएम का खजाना खाली है। खाते में पैसे की कमी नहीं फिर भी लोग अपनी जरूरतें समय से पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
लोगों बैंकों पर भारी भीड़ देख हर कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा कि कि इस भीड़ में जाकर लाइन में खड़े हों। कड़ाके की इस ठंड में भूखे, प्यासे घंटों लाइन में लगने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि शाम तक उन्हें पैसा मिल भी जाएगा। फिर भी इस उम्मीद में लोग घंटों लाइन में लग रहे हैं।
करंजाकला ब्लाक के खरौना गांव निवासी राम आसरे सिंह कहते हैं कि वह मकान बनवा रहे हैं। सामग्री तो उधार भी मिल जा रही पर जो कारीगर और लेबर काम कर रहे उन्हें रोज पैसे देने होते हैं। इकट्ठा पैसा मिल नहीं पा रही है। खाता उनके नाम से है पर अवस्था अधिक होने के कारण ठंड में वह खुद लाइन लगाने नहीं जा सकते।
बेटा, भतीजा या भाई जाकर पहले लाइन लगाते हैं और जब काउंटर के करीब पहुंचते हैं तो वे फोन कर के बुलाते ंहैं। ऐसे में शाम को ही घर में तय हो जाता है कि अगले दिन सुबह कौन जाएगा लाइन लगाने। पिछले 20 दिनों से ऐेसा ही कर रहे हैं। कई दफा ऐसा भी हुआ है कि घंटों लाइन में खड़े होने के बाद भी पैसा नहीं मिला और खाली हाथ घर लौटना पड़ा।
बदलापुर के त्रिभुवनलाल श्रीवास्तव के परिवार में भी कुछ ऐसी प्लानिंग की जाती है। वह कहते हैं कि हजार पांच सौ के जो भी नोट घर की जरूरत के लिए रखे थे सब बैंक में जमा कर दिया। पिता और माता दोनों की तबीयत खराब रहती है। माता जी की दवा मुंबई से तो पिता की पीजीआई से चल रही है।
ऐसी कंडीशन में लाख पचास हजार रुपये घर में रहना जरूरी है। अब कभी दो हजार तो कभी वह भी नहीं मिल पाता है। नोटबंदी के बाद से बैंक और एटीएम पर लाइन लगाना जिंदगी का अहम हिस्सा बनकर रह गया है। यह इतना कठिन काम है कि परिवार का कोई एक सदस्य अकेले पूरा ही नहीं कर सकता, इसलिए सबका टाइमटेबल बन गया है।