जौनपुर के ऐतिहासिक चेहल्लुम की फाइल फोटो। फाइल फोटो
जौनपुर। अपनी ऐतिहासिक गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए प्रसिद्ध जौनपुर में लखनऊ के बाद प्रदेश में सबसे शिया समुदाय के लोग रहते हैं, जो इस समय मुहर्रम की तैयारी में जुट गए हैं। इस शहर में शिया समुदाय की उपस्थिति और उनकी सांस्कृतिक व सामाजिक भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। यह क्षेत्र न केवल प्रदेश के भीतर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना रहा है।
हाल ही में शिया कॉलेज में आयोजित एक मजलिस ने सामाजिक एकता, भाईचारे और इंसानियत का एक मजबूत संदेश दिया गया। इस आयोजन में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई के निधन के बाद उनके भारत में प्रतिनिधि अयातुल्ला डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने विशेष रूप से शिरकत की थी। शिया जामा मस्जिद के पेश इमाम मौलाना महफूज़ुल हसन खां, सैयद हसनैन दीपू बताते हैं कि मुहर्रम और सफर के महीनों में शिया, सुन्नी और बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग भी इमाम हुसैन का गम मनाते हैं।
यहां सदर इमामबाड़ा, शाहपंजा इमामबाड़ा की विशेष परंपरा है। काजी शबान व कल्लू मरहूम का इमामबाड़ा जैसे ऐतिहासिक स्थल मुख्य कार्यक्रमों के केंद्र हैं। जौनपुर में दो लाख से अधिक शिया समुदाय के लोग हजरत इमाम हुसैन की शहादत का गम मनाते हैं। यह एक ऐसा शहर जो अपनी सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए जाना जाता है,जो आज शिया समुदाय से जुड़ी विविध गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है।