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दस साल में 17 करोड़ का नुकसान

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जौनपुर। नगर पालिका परिषद जौनपुर को 2010 से लेकर अब तक 17 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय क्षति हुई है। इसके लिए तत्कालीन अधिशासी अधिकारियों (ईओ) और कर अधीक्षकों को जिम्मेदार माना गया है। इनके खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए एडीएम भू राजस्व राज कुमार द्विवेदी ने वर्तमान अधिशासी अधिकारी और ज्वाइंट मजिस्ट्रेट को पत्र भेजा है। दरअसल, नगर पालिका प्रशासन ने 490 दुकानों को कई साल पहले किराए पर दे दिया था। वही किराया अब भी वसूल किया जा रहा है। इनमें से कई दुकानें शहर में ऐसे इलाकों में हैं, जहां पांच से दस हजार से कम किराये पर दुकानें नहीं मिलती हैं। किराए पर दी गई दुकानों में 81 ऐसी हैं, जिनका किराया 100 रुपये से भी कम है। यही नहीं, इतना कम किराया होने के बावजूद अब भी आवंटियों पर इन दुकानों का 23 लाख 4580 रुपये किराया नगर पालिका में जमा नहीं हुआ है। नगर पालिका जौनपुर ने 490 दुकानों को किराये पर दिया है। इनसे से हर माह किराया लेने का प्रावधान है, लेकिन सितंबर माह में की गई समीक्षा में यह बात सामने आई कि इन दुकानों का नवीनीकरण ही नहीं हुआ है और कई साल पहले निर्धारित किराया ही संबंधित दुकानदारों से वसूल किया जा रहा है। खास बात यह है कि 490 दुकानों में से 81 ऐसी हैं, जिनका सौ रुपये से भी कम किराया है। इसके अलावा 170 दुकानों का किराया 201 रुपये से लेकर 200 रुपये प्रतिमाह तक है। इसी तरह से 175 दुकानों का किराया 201 रुपये से लेकर 500 रुपये प्रतिमाह है। इसी तरह से पांच दुकानों का किराया 1001 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक प्रतिमाह है। नवीनीकरण नहीं होने से नगर पालिका प्रशासन राजस्व का काफी नुकसान हो रहा है। यही नहीं, इतना कम किराया होने के बाद भी इन दुकानों का 23 लाख 4580 रुपये किराया बकाया है। नगर पालिका प्रशासन की तरफ से अब नए सिरे से किराए के निर्धारण की तैयारी की जा रही है। अब तक हुए राजस्व की क्षति व किराए के निर्धारण के लिए तीन अधिकारियों की टीम गठित की गई है। इसमें एसडीएम, वरिष्ठ कोषाधिकारी, ईओ नगर पालिका शामिल हैं। साथ ही समय-समय पर समिति के कार्यों की समीक्षा अपर जिलाधिकारी-भू राजस्व भी कर रहे हैं। उन्होंने अब ईओ को पत्र भेजा है। जिसमें कहा गया है कि इन दुकानों का मासिक किराया पांच हजार ही माना जाए तो 2010 से लेकर अब तक 17 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय क्षति हो चुकी है। एडीएम भू-राजस्व राज कुमार द्विवेदी के मुताबिक अधिकांश दुकानें किराए पर कब आवंटित की गईं, इसकी अब तक की जांच में जानकारी ही नहीं हो पाई है। हालांकि जांच में यह बात अवश्य सामने आई है कि इनमें से कुछ दुकानें 30 साल की लीज पर 1972-73 में दी गई थीं, जिनका 30 साल बाद नवीनीकरण ही नहीं किया गया, जबकि इनमें से 25-30 प्रतिशत किरायेदारों की मौत हो चुकी है। उन्होंने बताया कि नगर पालिका को हुए इस नुकसान के लिए वर्ष 2010 से लेकर अब तक तैनात रहे अधिशासी अधिकारियों (वर्तमान को छोड़कर) तथा कर अधीक्षकों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए ईओ को पत्र भेजा गया है।
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