जौनपुर। बिठुर के संत डा. विनय स्वरूप ब्रह्मचारी ने कहा कि ज्ञान से ही मनुष्य ब्रह्म का ज्ञान होता है। ज्ञानी व्यक्ति सबको व सबकुछ अपना मानता है। लेकिन भक्त सब कुछ प्रभु का मानता है। वह सांस्कारिक बंधनों व स्वयं को भी प्रभु के चरणों में अर्पित कर देता है। वह बड़े हनुमान मंदिर के पास स्थित मां सिद्धिदात्री मंदिर परिसर में भक्तों के बीच प्रवचन कर रहे थे। इसके बाद भी दोनों अभिन्न हैं। जिसे एक साथ नहीं देखा जा सकता। इसी प्रकार ईश्वर विभिन्न आयामों के बाद भी एक है। परस्पर विरोधी गुण पर ब्रह्म , परमेश्वर में ही समाहित है। जो मनुष्य में संभव नहीं है। विलक्ष्ण है प्रभु की माया। जो समान अपराध पर किसी को दंड देते हैं तो किसी को पुरस्कार। प्रभु के इसी न्याय का मर्म बताते हुए कहा कि राजा बलि को पराई स्त्री को अपना बनाने पर मृत्यु दंड दिया। क्योंकि उसने बल पुर्वक यह कर्म किया। पर बालि और रावण के बध के बाद सुग्रीव को तारा एवं विभीषण को मंदोदरी कन्या दान के भाव से सौंपी। ताकि वह संरक्षित रहे। दोनों ने दूसरे की पत्नी पाई। लेकिन प्रभु के आदेश से । इसमें उनका कोई प्रयास नहीं था। समारोह में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष ने दीप प्रज्वलित कर शुरूआत की। आयोजन के मुखिया मानसमणि पंडित राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि भगवान जब प्रसन्न होते हैं तो भक्त को वैभव और भक्ति प्रदान करते हैं। क्योंकि वह करुणा का सागर है। संस्थाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह, सत्यप्रकाश त्रिपाठी, प्रो. आरएन त्रिपाठी, रामेश्वर त्रिपाठी, महेंद्र यादव, राजमन यादव, प्रेमशंकर यादव, एसपी सिंह, गोपाल कृष्ण, शंभूनाथ शुक्ल आदि मौजूद थे।