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कन्या पूजन से होती है अभीष्ट सिद्धि की प्राप्ति

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मछलीशहर। मां दुर्गा के पूजन में जहां बटुक भैरव की उपासना को अनिवार्य बताया गया है वहीं कन्या पूजन के दौरान देवी के विभिन्न रूपों का दर्शन प्राप्त करने की मान्यता है। भैरव जिनको शिव का ही रूप माना गया है। इनके पूजन से ही मां की पूजा पूर्ण होती है। काली तंत्र के अनुसार भैरव के पूजन से ग्रह जन्य पीड़ा से मुक्ति मिलती है तथा प्रेत बाधा भी दूर होती है। बच्चों के ग्रह जन्य रोग दूर होते हैं। इनका जप करने से सात जन्मों के संचित पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार पूरे नवरात्र सामर्थ्य के अनुसार प्रतिदिन कुमारी पूजन करने का विधान है। यदि ऐसा संभव नहीं हो तो अंतिम दिन नौ कुमारियों के चरण धोकर देवी रूप मानकर उनका पूजन कर यथा रुचि मिष्ठान, भोजन कराना चाहिए तथा वस्त्र आदि देकर सत्कृत करना चाहिए। कन्या पूजन से देवी मां प्रसन्न होकर साधक के अभीष्ट की पूर्ति करती हैं। ज्योतिषविद डा. शैलेश मोदनवाल बताते हैं कि कन्या पूजन में दस वर्ष से कम उम्र की कन्या का ही पूजन करने का विधान है। दो वर्ष की कन्या में मां के कुंवारी रूप, तीन वर्ष की कन्या में त्रिमूर्तिनी रूप, चार वर्ष की कन्या में कल्याणी, पांच वर्ष की कन्या में रोहिणी, छह वर्ष की कन्या में काली, सात वर्ष में चंद्रिका, आठ वर्ष की कन्या में शांभवी, नौ वर्ष की कन्या में दुर्गा तथा दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा स्वरूपा माना गया है। शास्त्रों में एक कन्या पूजन से ऐश्वर्य, दो के पूजन से मोक्ष, तीन के पूजन से धर्म, अर्थ, काम त्रिवर्ग की प्राप्ति, चार की अर्चना से राज्यपद, पांच के पूजन से विद्या, छह के पूजन से षटकर्म सिद्धि, सात की पूजा से राज्य की, आठ की पूजा से संपदा और नौ कुमारियों के पूजन से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।
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