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लुप्त हो रहे नागपंचमी पर होने वाले परंपरिक खेल

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जौनपुर। एक दशक पहले तक नागपंचमी की तैयारियां महीने भर पहले ही शुरू हो जाती थीं। क्षेत्र के अखाड़े और स्कूलों में दंगल और पारंपरिक प्रदर्शन की तैयारियां होती थी। कुश्ती, कबड्डी, गदा, डंबल और नाल फेरने की प्रतियोगिताएं होती थी। इन खेलों में युवा वर्ग तो रुचि लेता ही था पर बुुजुर्ग भी पीछे नहीं रहते थे। अब तमाम पारंपरिक खेल लुप्त होते जा रहे हैं।
बरसात शुरू होते ही गांव-गांव अस्थाई अखाड़े खोद दिए जाते थे। इनमें लोग रियाज करते थे। इसके अलावा ऊंची कूद, लंबी कूद, कबड्डी, डंबल, नाल आदि पर लोग हाथ आजमाते रहते थे। नाग पंचमी पर दंगल और खेलों में अपने मुहल्ले की टीम को जिताने की होड़ लगी रहती थी। इसमें युवकों के साथ बुजुर्ग भी शामिल हो जाते थे। मगर अब पारंपरिक खेलों की जगह नहीं रही। खिलाड़ियों का भी इनसे रिश्ता नहीं रह गया है। वे अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में आयोजित होने वाले खेलों में ही हाथ आजमाते हैं। आज कुश्ती, दंगल और व्यायाम न केवल स्कूल-कॉलेजों में भी नहीं होते हैं। सामाजिक संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले आयोजन भी बंद हो गए हैं। नागपंचमी पर अखाड़ों में दंगल के प्रदर्शन होते थे लेकिन अब गिने चुने स्थानों पर ही नागपंचमी पर अखाड़े सजते हैं। मोकलपुरनिवासी खेल प्रशिक्षक कुंवर सिद्धार्थ कहते हैं कि नाग पंचमी पर अवकाश बंद कर सरकार ने इसकी परंपरा को ही खत्म कर दिया है। पहले छुट्टी होती थी तो स्कूलो ंमें दंगल के आयोजन किए जाते थे। वैसे भी अखाड़ों की जगह अब जिम ने ले ली है। अब सेहत बनाने के बजाय लोग शरीर सौष्ठव पर ध्यान दे रहे हैं। जय बजरंग व्यायामशाला के कोच और सेना से रिटायर्ड पहलवान लालजी यादव कहते हैं कि पहले जहां हर आठ से दस गांव के बीच अखाड़ा हुआ करता था वहीं अब 50 लाख की आबादी वाले इस जिले में महज आठ से दस अखाड़े बचे हैं। इलाके के गिने चुने बच्चे और युवा कुश्ती के लिए आते हैं। कई उस्ताद खलीफा हैं जो लोगों को दांव-पेंच की कला सिखाने को आतुर हैं लेकिन कोई सीखने आता ही नहीं है।
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बचे हैं सिर्फ दस अखाड़े
जौनपुर। मौजूदा समय में जिले में दस अखाड़े संचालित हो रहे हैं। जिसमें सबसे अधिक अखाड़े सदर और सदर तहसील क्षेत्र में हैं। जो अखाड़े संचालित हो रहे हैं उसमें धर्मापुर, ठकुर्ची, बसौट, बहरीपुर, नरायनपुर, एकौनी, बड़वारेवीर, कोनियां, रामपुर नद्दी का अखाड़ा शामिल है।

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