जौनपुर। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था की ओर से रुहट्टा में आयोजित काव्य गोष्ठी में रचनाकारों ने हंसाया-गुदगुदाया तो व्यवस्था भी तंज भी कसा। रुमानी कविताएं भी सुनाईं गईं तो वीर रस में रचनाकारों ने हुंकार भरी।
शुरुआत रामजीत मिश्र ने ‘पहाड़ों को देखा पर दहशत न खाई, उठाता गया अपना सर धीर-धीरे’ से की। जर्नादन अस्थाना ने ‘ जरा सामने मेरे आकर तो बैठो’ गाकर मौसम को रूमानी बनाया तो आकिल जौनपुरी के शेर ‘भूखे को अपने पेट की रोटी से वास्ता’ ने मौजूदा हकीकत की ओर ध्यान खींचा। सभाजीत द्विवेदी प्रखर ने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को श्रद्धांजलि दी। अशोक मिश्र ने मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर आधारित रचना पढ़ी। असीम मछलीशहरी ‘मुझमें बाकी अगर वफा ही नहीं, फिर ये समझों कुछ बचा ही नहीं’ और डा. पीसी विश्वकर्मा ‘दूसरों की जब से सेवा में समर्पित हो गए, सब हमारे कर्म अपने आप हर्षित’ हो गए। अध्यक्षता डा. पीसी विश्वकर्मा ने की। मसीहा जौनपुरी, मोनिस जौनपुर, आसिफ फरूखाबादी, रूपेश, राजेश पांडेय, ओपी खरे, दमयंती सिंह, सुरेंद्र यादव, आलोक सिन्हा, सुशील दुबे आदि मौजूद रहे। संयोजक प्रो. आरएन सिंह रहे। प्रमोद वाचस्पति ने आभार जताया। संचालन अशोक मिश्र ने किया।