सिकरारा। आचार्य बाबूलाल मिश्र ने कहा कि बासुदेव जी जब इस लोक को छोड़ गोलोक जाने लगे तो उनके साथ चलने के लिए प्रभु के परम भक्त उद्धव ने भी चलने की इच्छा प्रकट की। भगवान ने अपने भक्त को समझाकर पृथ्वी लोक के उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने की जिम्मेदारी उद्धव जी को दी और बताया कि वे उनके न रहने पर उनके द्वारा प्रारम्भ की गई योजनाओं, कार्यों को आगे बढ़ाएं। इसी से वह उद्धव से प्रसन्न रहेंगे।
भागवत कथा की तीसरे दिन व्यास ने बताया कि जब उद्धव का सामना विदुर से हुआ तो उनको विदुर ने आलिंगनबद्ध कर बासुदेव के बारे में जानकारी ली। उनकी रानियों बच्चों का कुशल क्षेम पूछा। विदुर उद्धव की निष्काम भक्ति से बहुत प्रभावित थे। उद्धव ने शिशुपाल वध के उपरांत उसे भी मोक्ष प्रदान करने की प्रभु की दयालुता को श्रेष्ठ कार्य बताया। कहा कि यदि मानव प्रभु को कुभाव से भी स्मरण करता है तब भी प्रभु उसे अपने उच्च पद पर आसीन करते रहते हैं। यही राजा शिशुपाल के साथ भी हुआ। वह सदैव कृष्ण को हराने, अपमानित करने , नीचा दिखाने के बारे में सोचता रहता था। बार-बार गलती करने के बाद भी कृष्ण उसको क्षमा करते रहे। अंत में जब वह एक सौ गलती की सीमा पार कर गया तो कन्हैया ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर उड़ा दिया लेकिन उसे परम धाम में स्थान दिया। राजा परीक्षित को कथा सुनाते हुए शुुकदेव ने बताया कि जब कमल नाल पर ब्रह्मा जी का उदय हुआ तो वे बैठे-बैठे चारों दिशाओं में देखने लगे। इस तरह हर दिशा में उनको एक-एक मुख हो गया। अपने को कमल नाल से जुड़े हुए देख उनके मन में विस्मय हुआ कि यह नाल प्रलयंकर स्थिति में भी विनष्ट क्यों नहीं हुआ। जानकारी के लिए कमल नाल के सहारे जल में अंदर प्रविष्ट हुए तो वहां शेष पर सोये महा मानव (विष्णु) को देखा। वापस कमल पर बैठ कर प्रभु का स्मरण वंदन नमन करने लगे। वहीं पर भगवान ने उन्हें सृष्टि की रचना करने का आदेश दिया।