जौनपुर। जिले की प्रमुख नदी गोमती नदी के अस्तित्व संकट में है। नदी में लगातार पानी कम हो रहा है और वह दुबली हो गई है। शहर में कई स्थानों पर नदी की शक्ल नाले जैसी हो गई है। इससे जलीय जीवों पर भी संकट मंडराने लगा है। गंगा की सहायक नदी का पानी नालों के दूषित जल से इस कदर प्रदूषित हो गया है कि नदी में दुर्गंध उठने लगी है।
शहर में शाही पुल से लेकर सद्भावना पुल और शास्त्री पुल के आगे तक नदी की दशा बेहद खराब हो चुकी है। नदी का पानी घाट को पहले ही छोड़ दिया था अब घाटों पर सिर्फ कचरा जमा है। पानी तलहटी में चला गया है। पानी का बहाव भी मंद पड़ता जा रहा है। गोमती नदी एक ऐतिहासिक नदी है। नदी के दोनों किनारों पर जौनपुर शहर बसा हुआ है। धीरे-धीरे नदी का दायरा कम होने लगा है। शहर के नाले नदी में गिराए जा रहे हैं। नदी का जल स्रोत भूजल है, जिसका जलस्तर तेजी से गिर रहा है। इससे नदी सूखने लगी है। स्वच्छ गोमती अभियान के अध्यक्ष गौतम गुप्ता कहते हैं केंद्र व प्रदेश सरकार नदियों की स्वच्छता व निर्मलता को लेकर गंभीर व संवेदनशील हैं। इसके बावजूद नगर के बीच स्थित हनुमान घाट के नाले के कारण मां गोमती बदहाल हो रही है और प्रशासनिक महकमा जरा भी चिंतित नहीं है। कि नदी में ऐसे गंभीर प्रदूषण जैसे हालात पूरे नगरीय क्षेत्र में है। जिसके निवारण के लिए नालों को बंद किया जाना बेहद जरूरी है। पर्यावरण के जानकार एवं रिटायर्ड प्राध्यापक डा. डीपी उपाध्याय कहते हैं कि नदियों में पानी सूखने की मुख्य वजह पानी एकत्रित होने वाले स्रोतों को समतल बना दिया गया है। स्रोत सूख गए हैं। अब नदियां सिर्फ बरसात आधारित रह गई हैँ। सिंचाई में जमीन का पानी का दोहन हो रहा है। पानी का लेबल तेजी से नीचे भाग रहा है। नदियां सूख रही हैं और धीरे-धीरे एक्सपर्ट जोन में पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि नदियों का बहाव कम हो गया है। गहराई भी नहीं रह गई है।
पीलीभीत के गोमत ताल से निकली है गोमती
जौनपुर। गोमती नदी प्रदेश की भूजल आधारित नदी है। यह नदी पीलीभीत जनपद के माधोटांडा स्थित गोमत ताल जिसे फुल्लर झील के नाम से भी जाना जाता है वहीं से निकलती हैं। 10 जिलों से होती हुई 930 किमी का लंबा सफर तय करते हुए गाजीपुर स्थित कैथी में मार्कण्डेय महादेव के पास गंगा में समाहित हो जाती हैं। यह नदी भूजल आधारित है इसलिए इसके उद्गम स्थल पीलीभीत में इसके स्रोत पर ही सबकुछ निर्भर है। किंतु विगत 10 वर्षों में दुर्भाग्य स्वरूप उपरोक्त गोमत ताल पूरी तरह से सूखने के कगार पर पहुंच चुका है। जिससे नदी में जल स्तर दिन प्रतिदिन गिरता ही जा रहा है। गोमत ताल अपने वास्तविक स्थिति से 80 प्रतिशत सूख चुका है।
बंद हो रहे जमीन के अंदर पानी डालने के श्रोत
जौनपुर। भू-गर्भजल दोहन लगातार हो रहा है। पहले पानी की जरूरतें लोग कुएं से पूरी करते थे लेकिन अब हालात यह हैं कि मकान बनने से पहले बोरिंग होती है और सबमर्सिबल लग जाता है। पहले भूजल रिचार्ज के स्रभनोत भी ज्यादा थे। अब सड़क या मकान के रूप में जमीन का बहुत सा हिस्सा पक्का हो गया है जिससे बारिश का पानी नाली और नालों के माध्यम से बह जाता है और धरती की प्यास नहीं बुझ पाती। बारिश में भी भारी कमी आई है। करीब पांच साल पहले तक जिले में बारिश का औसत 800 से 900 एमएम था जो अब सिमटकर 250 से 300 एमएम तक हो गया है।