बदलापुर / घनश्यामपुर। समय, शक्ति व संपत्ति का सदुपयोग योग है। जबकि उसका दुरुपयोग ही भोग है। भगवान श्रीकृष्ण दोनों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं। वह 56 भोग महोत्सव भी करवाते हैं और उपवास भी। उक्त बातें मानस कोविद डा. मदन मोहन मिश्र ने बबुरा गांव में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन शनिवार को श्रोताओं को कथा का रसपान कराते हुए कही।
उन्होंने कहा कि वह भगवान श्रीकृष्ण यदि नग्नावस्था में स्नान के दौरान गोपियों के चीर का हरण करते हैं तो भरी हुई सभा में आतताइयों से बचाने के लिए द्रोपदी के चीर को बढ़ाते भी हैं। आज समाज में चीर हरण करने वालों की तादाद ज्यादा है जबकि चीर बढ़ाने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। कन्हैया गोचारण करते समय पैर में जूते नहीं पहनते हैं। अन्य ग्वाल बालों की ही तरह फटे पुराने कपड़े पहन कर उन्हीं के साथ रहकर सच्चे समाजवाद का परिचय देते हैं। बिना शस्त्र उठाए अघासुर, वक्रासुर ,शक्तासुर ,धेनुकासुर व कंस आदि आतताइयों का सहज ही विनाश कर देते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पूजा के माध्यम से पहाड़, नदी व वन के संरक्षण का भी संदेश समाज को देने का काम किया है। गोपियों के साथ उनकी रासलीला का तात्पर्य जीव का ब्रह्म से मिलन है। उन्होंने कहा कि संसार में रहकर कर्तव्य का पालन करते हुए किंतु संसार से मोह न करते हुए भगवान की प्राप्ति कर लेना ही श्रीमद्भागवत की कथा का उद्देश्य है। कथा के समापन पर श्रद्घालुओं को प्रसाद वितरण किया गया। इस मौके पर डा. धर्मेंद्र शुक्ल, पूर्व प्रधानाचार्य गणेशदत्त शुक्ल, विनोद कुमार सिंह, रामबेचन शुक्ल, उमा पांडेय, रमाशंकर त्रिपाठी, रामलाल मौर्य आदि मौजूद थे।