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रात सवा आठ के बाद होगी होलिका दहन का है मुहुर्त !

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जौनपुर। होली हिंदुओं का प्रमुख पर्व है। फागुन माह की पूर्णिमा तिथि की रात में होलिका दहन किया जाता है। तत्पश्चात अगले दिन रंग अबीर गुलाल के माध्यम से होली मनाई जाती हैं। इस वर्ष बुधवार की रात में होलिका दहन होगा। फिर अगले दिन गुरुवार को रंग खेला जाएगा। विद्वानों का मानना है कि होलिका दहन का मुहूर्त रात सवा आठ बजे के बाद मिल रहा है। वैसे तो हर त्यौहार का अपना एक अलग आनंद होता है। लेकिन होली के त्योहार का आनंद कुछ विशेष होता है। इसमें एक ओर रंगों के माध्यम से हमारी संस्कृति के रंग में रंगकर सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं। सब एक रंग में रंग जाते हैं वहीं दूसरी ओर धार्मिक दृष्टि से भी होली बहुत महत्वपूर्ण हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन स्वयं को ही भगवान मान बैठे हिरण्य कश्यप ने भगवान की भक्ति में लीन अपने ही पुत्र प्रह्लाद को अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जिंदा जला देना चाहा था। लेकिन भगवान ने भक्त पर अपनी कृपा प्रकट की और प्रह्लाद के लिये बनाई गई चिता में होलिका ही जलकर मर गई। तभी से इस दिन होलिका दहन की परंपरा शुरू हो गई । होलिका दहन के अगले दिन खुशी का इजहार करते हुए लोगों द्वारा रंगों से खेला जाता है। विद्वानों ने होलिका दहन के संबंध में तीन धर्मशास्त्रीय नियम निर्धारित किये है। पहला फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा हो, दूसरा रात का समय हो, तीसरा भद्रा बीत चुकी हो। ऐसे में 20 मार्च बुधवार को रात आठ बजकर 12 मिनट के बाद भद्रा बीतने पर होलिका दहन के लिए निर्धारित सभी मुहूर्त मिल रहे है। सवा आठ बजे के बाद होलिका दहन किया जाएगा।
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हरि प्यारे छिपि बैठेव कौनेव अमवा के डारे
बदलापुर । पहले की होली में गांवों की चौपालों में बसंत पंचमी से फाग गीत फिजाओं में गूंजने लगता था। आपस के मनमुटाव को खत्म करने का दिन भी यही होता था। होलिया फाग में लोग गिले शिकवे भूलकर गले मिलकर संग झूमते थे। धीरे-धीरे अब होली गीतों की परंपरा मंद पड़ने लगी है। बूढ़े चेहरों की झुर्रियों में इसकी कसक साफ झलकती है। बसंत लगते ही लोग चौपालों में बैठकर ढोल, झांझ व मजीरे की धुन पर ‘निरखत जाय जटायू रथ का, मन बसा मोर वृंदावन मा, एबालम बिनु बिरहिन हवै अधीर तथा उडि जाव पंछी जहां हरि प्यारे छिपि बैठे व कौनेव अमवा के डारे, कुहू कुहू रट लाना’ जैसे गीतों से सराबोर टोलियां गांव की गलियों में घूमने लगती थी। लहलहाती फसलों को देख मुदित किसान ढोल मजीरा लेकर चौपालों को गुलजार रखते थे। 85 वर्षीय मनोरथ बिंद व भगत तिवारी का मन रह-रह कर कचोट रहा है, उन्हें याद आता है वह समय जब फागुन के गीतों को सुनाने के लिए देर रात तक चौपालें गुलजार रहती थी। उम्र दराज लोगों ने चिंता जताई कि आने वाले समय में कहीं गांव की संस्कृति खत्म न हो जाए। हंकारपुर गांव निवासी माताप्रसाद उपाध्याय ने कहा कि एक दौर था जब महीनों पहले से लोग त्यौहार की तैयारियों में जुटे ग्रामीण शाम को चौपाल में फाग गाने को एकत्र होते थे, लेकिन अब तो सिर्फ रंगों का त्योहार ही फीका नहीं हुआ, बल्कि लोगों में दूरियां भी बढ़ी हैं।
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