सिकरारा। आम के बागों से बौर की महक और सरसों के खेतों में बसंत का रंग आ गया है। आधा फागुन बीतने के बाद भी होली के पारंपरिक गीत सुनाई नहीं दे रहे हैं। महा शिवरात्रि से लोक संगीत की मिश्री कानों में घुलने लगती थी लेकिन अबकी ढोलक, मंजीरा की ताल नहीं सुनाई दे रही है। उनकी जगह दोअर्थी गीत जरूर बज रहे हैं, जिनमें फाग, चकहा, चौताल, धमार, फगुआ और होरी की पारंपरिक धुनों की मिठास नदारद है। शेरवा गांव के रहने वाले चौताल गायक रामशकल उपाध्याय कहते हैं कि होली गीतों का साहित्य बहुत ही समृद्ध है लेकिन इसकी कोई पुस्तक नहीं है। धुन और गीत दोनों गायकों के माध्यम से यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहे हैं। गाने वाले कम हो गए तो गीत भी लुप्त होते जा रहे हैं। दो दशक से यह सिलसिला जारी है। इसके संरक्षण का भी कोई यत्न नहीं हुआ। इक्का-दुक्का गायक तो हैं लेकिन ढोलक बजाने वाले नहीं मिल रहे हैं। बसंत पंचमी को गांव-गांव में होलिका लगा दी जाती थी। चालीस दिनों तक गायन वादन चलता था। चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि स्वर लहरियां उठती रहती थीं। फगुआ और धमार गाया जाता था। समापन पर चैता भी इसमें शामिल हो जाता था। रात के 11 बजे तक लोग दुनियादारी भूल कर गायन-वादन में रम जाते थे। राधा-कृष्ण के संयोग-वियोग के गीत गाए जाते थे। शृंगार के गीत‘ मैं तरुनी हरि छोट मिलेऊ’, ‘रतियां बलमा तोरी सेज झुलनिया हेरानी ’ ‘सांवरिया जुलुम गुजारा हो हमारी सेजरिया में ’ जैसे शृंगार के गीतों में भी आज के लोकगीतों की तरह की फूहड़ता नहीं थी। लोक कला संस्थान के डा. मनोज मिश्रा इन गीतों के संरक्षण की बात करते हैं। इंटर कालेज शाहपुर के प्रधानाचार्य सुधाकर उपाध्याय का कहना है कि पारंपरिक होली गीतों में जो लालित्य, माधुर्य है, वह अनूठा है। इसे सहेजना चाहिए।