उरई। पति, पत्नी या पिता की मौत के बाद पीछे छूट गए लोग असहाय हैं। किसी के बेटे की पढ़ाई छूट गई...। किसी की बेटी की शादी अटकी गई। यह पालिका में सालों तक काम करने वाले उन 21 संविदा कर्मचारियों का है जिनकी मौत के बाद उनका परिवार बिखर गया। पीएफ और बकाया वेतन से जिंदगी संभालने की उम्मीद टूट चुकी है। पालिका की उदासीनता और कागजों की गड़बड़ी के नाम पर टालमटोल ने इन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया है। इसके अलावा 256 संविदा कर्मचारी भी जिन्हें अभी तक उनके पीएफ का ब्योरा नहीं मिल सका है।
जानकारी के मुताबिक वर्ष 2018 में नगर पालिका के 256 कर्मचारियों के वेतन से अचानक 1949 रुपये काट लिए गए। यह सिलसिला लगातार कई महीनों तक चलता रहा। जब कर्मचारियों ने पूछताछ की तो बताया गया कि यह राशि उनके भविष्य निधि (पीएफ) के लिए काटी जा रही है। शुरुआत में कर्मचारियों ने अधिक ध्यान नहीं दिया, लेकिन 2019 में जब सभी ने एकजुट होकर पीएफ का पूरा हिसाब मांगा तो पालिका कोई स्पष्ट ब्योरा नहीं दे सकी। इसके बाद नगर पालिका ने कर्मचारियों की तनख्वाह से हर महीने 750 रुपये काटने का नया नियम लागू किया और दावा किया कि उतनी ही राशि पालिका भी जोड़ेगी।
2018 से 2025 के बीच 21 संविदा कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। जब उनके परिजनों ने पीएफ और बकाया वेतन की मांग की तो नगर पालिका ने हाथ खड़े कर दिए। परिणामस्वरूप परिवार आज भी संघर्ष कर रहे हैं।
पीड़ित परिवारों की दर्दभरी दास्तान
सीमा देवी की टूट चुकी दुनिया
सीमा देवी की आंखें नम हो जाती हैं जब वह पति को याद करती हैं। नगर पालिका में संविदा कर्मचारी रहे उनके पति की कैंसर से 25 जून 2023 को मृत्यु हो गई थी। पति के गुजरने के बाद घर की जिम्मेदारी पूरी तरह उन पर आ गई। उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम पति का पीएफ और बकाया वेतन मिल जाएगा। इससे बच्चों की पढ़ाई और बेटी की शादी में सहारा मिलेगा, लेकिन नगर पालिका से उन्हें आज तक एक पैसा नहीं मिला। सीमा ने बताया कि पति के इलाज में हमने घर गिरवी रख दिया, सब कुछ बेच दिया। सोचा था मरने के बाद कम से कम पालिका से कुछ मदद मिलेगी, पर आज तक केवल आश्वासन ही मिला। दस हजार रुपये की आउटसोर्स की नौकरी से घर नहीं चल पाता। बेटा मजदूरी करता है, उसकी पढ़ाई छूट गई। बेटी की शादी करनी है, पर इंतजाम शून्य है। हर दिन बच्चों की आंखों में उम्मीद देखती हूं, लेकिन मेरे पास कोई जवाब नहीं होता।
जितेंद्र की जिम्मेदारियों का बोझ
जितेंद्र की पत्नी भी नगर पालिका में संविदा कर्मचारी थीं। अप्रैल 2021 में बीमारी से उनका निधन हो गया। अब घर पर तीन छोटे बच्चों की परवरिश का भार जितेंद्र पर है। जितेंद्र ने बताया कि पत्नी के निधन के बाद से ही तीन बच्चों की पढ़ाई लगभग ठप हो गई। बेटी की शादी करनी है, लेकिन पैसों का इंतजाम करना मुश्किल से लगने लगा है। पीएफ और बकाया वेतन की उम्मीद में कई सालों से पालिका के चक्कर लगा रहा हूं, पर हर बार टाल दिया जाता है। खुद भी पालिका में ही काम करता हूं। अकेले की कमाई से घर चलाना ही मुश्किल है। आज तक केवल झूठे आश्वासन ही मिले हैं।
कुलदीप की अधूरी पढ़ाई और टूटा बचपन
कुलदीप उस दर्द का जिक्र करते हुए चुप हो जाते हैं, जब उनके पिता संतोष की पांच साल पहले मृत्यु हो गई थी। मां भी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके सिर पर केवल दादी का सहारा है। कुलदीप ने बताया कि पिता के जाने के बाद घर की रोशनी बुझ गई। मैं पढ़ाई करना चाहता था, लेकिन पैसों की कमी ने किताबें छीन लीं। दादी के साथ किसी तरह दिन गुजर रहे हैं। पांच साल से लगातार पालिका के चक्कर काट रहा हूं, लेकिन न पीएफ मिला और न ही कोई सहायता। मैं नाबालिग हूं, फिर भी घर की जिम्मेदारी को ढोना पड़ रहा है।
विभाग का तर्क: कागजों की गड़बड़ी
सफाई निरीक्षक संदीप कुमार ने बताया कि जब वर्ष 2018 में पहली बार नगर पालिका में तैनात हुए थे, तभी संविदा कर्मचारियों का पीएफ शुरू करवाया था। इसके बाद स्थानांतरण हो गया था। लगभग दो माह पहले यहां दोबारा तैनाती हुई है और आते ही यह मामला सामने आया है। जानकारी मिली है कि कई कर्मचारियों और मृतक कर्मियों के परिजन पीएफ न मिलने की शिकायत कर रहे हैं। इस संबंध में जांच की जा रही है। अब तक एक-दो लिखित शिकायतें मिली हैं, जिन पर कार्रवाई चल रही है। जिस किसी का पीएफ रुका है या नौकरी की स्थिति स्पष्ट नहीं है, वह पालिका में आकर कागजात दिखाए, हम समस्या का समाधान करेंगे।
सफाई निरीक्षक ने यह भी स्वीकार किया कि पीएफ की शुरुआत के समय कई गड़बड़ियां हुई थीं। आधार कार्ड, नाम, जन्मतिथि और अन्य व्यक्तिगत विवरण में गलतियां रह गई थीं। यही वजह है कि कई कर्मचारियों का पीएफ अटक गया। उस समय दस्तावेजों की जांच उतनी सख्ती से नहीं होती थी, जिस कारण छोटे-छोटे अंतर भी अब बड़ी समस्या बन गए हैं। कुछ कर्मचारियों के कागजात अधूरे या गलत हैं, इसलिए उनका पीएफ जारी नहीं हो पा रहा है। हम जल्द ही इन सभी कमियों को दूर करके हर कर्मचारी को उसका हक दिलाने का प्रयास करेंगे। किसी भी पात्र परिवार को वंचित नहीं रहने दिया जाएगा।
यूनियन का आरोप : पालिका ने पैसा हजम कर लिया
सफाई यूनियन के जिलाध्यक्ष संतोष कुमार और अजय का कहना है कि वह पांच वर्षों से मृतक कर्मचारियों के परिजनों के हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोई सुनवाई नहीं हो रही। शिकायतें लखनऊ, कानपुर और झांसी तक पहुंचाई गईं पर परिणाम शून्य रहा। यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया कि पालिका ने कटे हुए पूरे पैसे हजम कर लिए हैं। जिन कर्मचारियों ने शहर की सफाई में दिन-रात मेहनत की, उन्हीं के परिवार आज दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।
सभी कर्मचारियों का पीएफ नियमित रूप से जमा किया जा रहा है। मृतक कर्मचारियों के मामलों की जानकारी नहीं है। उस समय पीएफ की कटौती की व्यवस्था नहीं थी। बाकी की स्थिति की जानकारी लेकर कार्रवाई की जाएगी।
- राम अचल कुरील, ईओ, नगर पालिका, उरई