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वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फतेह

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नरेंद्र जीत सिंह - फोटो : ORAI
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उरई। सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह की 353 वीं जयंती प्रकाश पर्व के रुप में मनाई गई। राठ रोड स्थित गुरुद्वारे को रंग बिरंगी रोशनी व फूलों से सजाया गया। हर धर्म के लोग गुरुद्वारे माथा टेकने पहुंचे। इस दौरान संगत ने शबद कीर्तन गाए गए और गुरु के विचारों के बारे में अवगत कराया गया। इसके बाद गुरुद्वारे में ही आयोजित लंगर में देर शाम तक लोगों की भीड़ लगी रही।
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राठ रोड स्थित गुरुद्वारे में गुरु सिंह सभा की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सरदार हरजीत सिंह ने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व की तैयारी एक हफ्ते से चल रही थी। रोजाना ब्रह्म मुहूर्त में प्रभातफेरी निकाली गई। इसके बाद 28 घंटे का अखंड पाठ शुरू किया गया। जो मंगलवार को समाप्त हुआ। उन्होंने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह गुरु तेग बहादुर सिंह के पुत्र थे और उन्होंने पंजाब के आनंदपुर के पास केशगढ़ साहिब में खालसा की स्थापना की। जिसे वाणी दी कि वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फतह कहा जाता है।
वे फारसी, हिंदी, संस्कृत, ब्रजभाषा के ज्ञाता थे। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए मुगलों से लड़ते हुए अपने दो बेटे अजीत सिंह और जुझार सिंह को चमकौर के युद्ध में तथा दो अन्य बेटों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को जिंदा दीवारों में चुनवा दिया था। उनका जीवन लोगों की सेवा, सत्य, न्याय के जीवन मूल्यों के प्रति समर्पित रहा। उनकी शिक्षाएं आज भी हमें प्रेरित करती है। गुरु गोबिंद सिंह का इतिहास बलिदान का इतिहास है, उन्होंने मानवीय मूल्यों की रक्षा करते हुए बलिदान की परंपरा का सर्जन किया था। उन्होंने पहले बलिदान के पथ का स्वयं अनुसरण करके दिखाया। इस दौरान सरदार हरदयाल, सुरजीत सिंह, आज्ञा सिंह, जसवंत सिंह, नरेंद्र सिंह, यशवीर सिंह, तरनजीत सिंह, कुलमीत सिंह, सतनाम सिंह, हरदीप सिंह, संदीप सिंह, ज्ञानी कुलदीप सिंह, परमजीत सिंह, गुरजीत कौर, बलजीत कौर आदि रहे।
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सेवा भाव से जीता दिल
गुरजीत कौर ने बताया कि जयंती में सेवा भाव से कार्य किए जाते हैं। सेवादार श्रद्धालुओं के जूते चप्पल अपने हाथों में लेकर उन्हें एक स्थान पर रखते हैं। इसके अलावा गुरुद्वारे आने वालों के हाथ पैर धुलवाने को भी तत्पर रहते हैं।
लंगर में नहीं होता भेदभाव
कुलवीर कौर बताती हैं कि शबद कीर्तन के बाद लंगर का भव्य आयोजन किया जाता है, इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं होता है। राह चलते लोगों को बुला बुलाकर लंगर खिलाया जाता है। लोग भी प्रेम से लंगर छकते है।
अच्छे कर्म करें, बुराई से रहें दूर
नरेंद्रजीत सिंह का कहना है कि गुरु का संदेश था कि अच्छे कर्म करें और बुराई से दूर रहे। उनके इसी संदेश को जयंती के माध्यम से भी प्रसारित करने का प्रयास किया जाता है। जीवन में कभी किसी का बुरा मत सोचो।
धर्म की रक्षा के लिए किया बलिदान
तरनजीत सिंह ने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह सर्वस्व दानी और बलिदानी थे, उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने चारों पुत्रों का बलिदान कर दिया था। उनका बलिदान प्रेरणादायी है और उनकी शहादत अविस्मरणीय है। उन्होंने मुगलों का डटकर मुकाबला किया।

कवलीन कौर- फोटो : ORAI

तरनजीत सिंह- फोटो : ORAI

गुरुद्वारे में लंगर छकते लोग- फोटो : ORAI

गुरु जीत कौर- फोटो : ORAI

गुरुद्वारे में शब्द कीर्तन करते लोग- फोटो : ORAI

गुरुद्वारे में गुरु गो विंद सिंह के बारे में जानकारी देते सरदार हरजीत सिंह।- फोटो : ORAI

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