भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री दादा बाबूराम एमकॉम के निधन पर भाजपाइयों ने उन्हे
भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। वक्ताओं ने कहा पार्टी ने अपना आधार स्तंभ खो दिया है।
गुरुवार को कोंच भाजपा अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता के आवास पर हुई हुई बैठक में जिले के राजनीतिक पुरोधा को दो िमिनट रह कर श्रद्धांजलि दी गई। कार्यकर्ताओं ने कहा दादा बाबूराम पार्टी के आधार स्तंभ थे ।
उन्होंने जिले ही नहीं बुंदेलखंड में भाजपा को मजबूत बनाया था। इससे वह पार्टी के पर्याय बन गए थे। उनका निधन पार्टी के लिए अपूर्णीय क्षति है। सुनील शर्मा, सुनीलकांत तिवारी, प्रदीप गुप्ता, अमित उपाध्याय, नरेश वर्मा व डीके सोनी
मौजूद रहे।
सांसद भानु प्रताप सिंह वर्मा, बारसंघ कोंच अध्यक्ष विनोद अग्निहोत्री, बारसंघ के पूर्व बरिष्ठ उपाध्यक्ष सुनील लोहिया पालिका चेयरपर्सन प्रतिनिधि विज्ञान विशारद सीरौठिया, सांसद प्रतिनिधि अनुरूद्घ मिश्रा आदि ने भी निधन पर शोक जताया है।
डॉ. वीरेन्द्रस्वरूप जूनियर हाईस्कूल में भी प्रधानाचार्या इंदिरा द्विवेदी की अध्यक्षता में हुई शोकसभा में दो मिनट मौन रखा गया। डॉ. एलआर श्रीवास्तव, लल्लूसिंह अग्रवाल, शशि मिश्रा, रमा खरे, अरूणा छावला आदि मौजूद रहे।
उतार चढ़ाव भरा रहा कारोबार से सियासत का सफर - उरई (जालौन)। दो दिसंबर 1934 को झांसी के ककरबई गांव में जन्मे बाबूराम एमकाम जिले की राजनीति के चाणक्य कहे जाते थे। जनसंघ के बाद भाजपा को मजबूत करने में उन्होने उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी।
राजनीति में आने से पहले वह कारोबारी रहे और इस दौरान उरई आकर बस गए थे। पार्टी में जिलाध्यक्ष से लेकर प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर उन्होने पार्टी को मजबूत किया था। उन्होने पहली बार वार्ड सदस्य का चुनाव लड़ा और जीतने के बाद पलट कर नहीं देखा। 1989 में वह उरई नगर पालिकाध्यक्ष निर्वाचित हुए।
उन्होेने उरई विधानसभा क्षेत्र से पांच बार चुनाव लड़ा । वह तीन बार विजयी हुए और दो बार उन्हे हार का सामना करना पड़ा। भाजपा सरकार में वह एक बार राज्यमंत्री और दो बार कैबिनेट मंत्री रहे।
बाबूराम एमकाम इमरजेंसी के दौरान 19 माह जेल में भी रहे। उन्हे राजनीति में उलटफेर करने में माहिर खिलाड़ी माने जातेा था। उनके दाव से कई बारा विरोधी परास्त हुए है। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में विरोधी भी उनकी चुनावी रणनीति का लोहा मानते थे। पूर्व मंत्री को पुत्र वियोग भी झेलना पड़ा।