विपरीत परिस्थितियां भी ताहिरा बानो का रास्ता न रोक सकीं। उसके गांव में
अब भी लड़कियों को पढ़ाई लिखाई की स्वतंत्रता नहीं है। फिर भी ताहिरा
संकल्प शक्ति की बदौलत न केवल अपने गांव की न सिर्फ पहली ग्रेजुएट लड़की
बनीं, बल्कि कालेज टाप कर दूसरी बार प्रखर बुद्धि पुरस्कार भी जीता।
ताहिरा
कुठौंद ब्लाक के अजीतापुर की रहने वाली हैं। उनके गांव के लोग गुजरात व
महाराष्ट्र में व्यापार करते हैं लेकिन लड़कियों की शिक्षा को लेकर आज भी
इनके ख्याल पुराने हैं। लड़कियों की शिक्षा के सवाल पर पूरा गांव एक सी राय
देता है और विवाह को शिक्षा से ज्यादा महत्व देता है। ग्रामीणों की इस
मानसिकता के कारण तमाम ऐसी लड़कियां जो प्रतिभाशाली हैं
और शिक्षित होना
चाहती हैं, वे भी नहीं पढ़ पातीं। ताहिरा भी इन्हीं बंदिशों का शिकार हुई।
हालांकि अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से उन्होंने समाज की संकुचित विचारधाराआें और
बंदिशों को तोड़ने में सफलता पाई। यही नहीं, वह गांव की पहली ग्रेजुएट
बनीं और अपने कालेज में लगातार दो बार टाप किया। उनकी इस सफलता में मां
इंताज बेगम और पिता समद खां का पूरा
योगदान रहा। ताहिरा ने बीए की पढ़ाई
करने के लिए गोहन स्थित केशव देव तिवारी महाविद्यालय मेें दाखिला लिया।
वर्ष 2015 में पढ़ाई पूरी कर अब स्नातकोत्तर करने की कोशिश में लगी है। कला
वर्ग में उसने तीनों वर्ष टाप किया। पिछले दिनों यहां डा. दिनेश चंद्र
द्विवेदी केे नाम पर दिए जाने वाले प्रखर बुद्धि पुरस्कार भी ताहिरा लगातार
दूसरे वर्ष अपने नाम किया।
पांच अन्य बहनों की भी प्रेरणा बनीं
ताहिरा
बानो अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान हैं। उनकी पांच बहनें गुलप्सां,
अमरीन, आफरीन, बुशर, इरमा फातिमा तथा भाई मुर्तजा हैं। इन सभी की पढ़ाई की
जिम्मेदारी वह खुद उठाए हैं। गुलप्शां बीएससी व अमरीन इंटर की पढ़ाई पूरी
कर रही है। अपनी बड़ी बहन की सफलता देख छोटी बहनें भी उत्साहित हैं। सब
मिलकर अशिक्षित परिवेश को बदलना चाहती हैं।