जालौन/आटा। आज मित्रता स्वार्थ पर आकर टिक गई है, पर दोस्ती का संबंध एक ऐसा संबंध है, जिससे बड़ा संबंध न तो कोई है और न ही होगा। यह बात ग्राम प्रतापपुरा स्थित शंकरजी मंदिर पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कथा वाचक प्रियंका शास्त्री ने श्रोताओं को कथा सुनाते हुए कही।
साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन कथा वाचक प्रियंका शास्त्री ने सुदामा-कृष्ण की मित्रता की कथा का वर्णन किया। कहा कि मित्रता अपने आप में एक परिपूर्ण रिश्ता है। इसमें स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता है। सुदामा चरित्र से पता चलता है कि कृष्ण ने इस संसार को सच्ची मित्रता का पाठ पढ़ाया है। सुदामा चरित्र के दौरान संगीतमय भजनों की प्रस्तुति से बैठे श्रोता भक्तिभाव से नृत्य भी कर रहे थे।
इस मौके परीक्षित प्रेमवती, प्रयागनारायण परिहार, विमल कुमार, अतुल कुंमार, दीपक, आनंद, विमला, प्रतिमा, अनुपमा आदि भक्त मौजूद थे। वहीं आटा में भागवत कथा के सातवें दिन भागवत व्यास देवांश जी महाराज द्वारा बताया गया की कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज कहां है।
दीनदयाल का धाम बता वत अपना नाम सुदामा सुनते ही द्वारकाधीश नंगे पांव मित्र की अगवानी करने राजमहल के द्वार पर पहुंचे। यह सब देख लोग समझ ही नहीं पाए कि आखिर सुदामा में ऐसा क्या है जो भगवान नंगे पैर दौड़े चले आए और बचपन के मित्र को गले लगा कर श्रीकृष्णा उन्हें राज महल के अंदर ले गए। अपने सिंहासन पर बैठा कर स्वयं अपने हाथों से उनके पैर पखारे। कहा कि सुदामा से भगवान ने मित्रता का धर्म निभाया है।
इस मौके पर कथा पंडाल में उपस्थित परमेश्वरी दयाल तिवारी, सुनीता आदि लोग मौजूद रहे।