उरई। मेडिकल कालेज में समस्याओं का अंबार है। डाक्टर न होने से ओपीडी में मरीजों की संख्या तो घट ही रही हैं, वार्डों में भी मरीजों का पलायन जारी है। जो मरीज भर्ती हैं, उन्हें इलाज के लिए परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कालेज प्रशासन सब कुछ जानने के बाद भी अनजान बना हुआ है।
चार सौ करोड़ की लागत से बने राजकीय मेडिकल कॉलेज की अप्रैल 2009 में ओपीडी की शुरुआत हुई थी। आठ साल बाद भी मेडिकल कॉलेज डॉक्टरों और स्टाफ की कमी से जूझ रहा है। डॉक्टरों और स्टाफ की कमी के चलते 16 में केवल तीन वार्ड ही मरीजों के लिए खोले गए हैं। इन तीनों वार्डों में 30 बेड हैं। लेकिन सुविधाओं की कमी के चलते तीमारदार मरीजों को यहां भर्ती कराने से कतराते हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस समय केवल 13 मरीज ही भर्ती हैं। कुछ डॉक्टरों के तबादले और कई के गैरहाजिर होने से ओपीडी में भी मरीजाें की संख्या घट गई है। सर्जन डॉ. राहुल इटौरिया, डॉ. देवाशीष कौशल, डॉ. पुष्पेंद्र अग्रवाल, कम्युनिटी मेडिसन में डॉ. धीरज महाजन और चर्म रोग विशेषज्ञ डॉॅ. प्रतीक शिवहरे लंबे समय से अवकाश पर चल रहे हैं। जिला अस्पताल से भी बदतर स्थिति में चल रहे मेडिकल कॉलेज आने से अब मरीज कतराने लगे हैं। सीएचसी, जिला अस्पताल व निजी अस्पतालों से गंभीर मरीजों को तीमारदार अपने मरीजों को कानपुर या झांसी रेफर करा लेते हैं।
इनसेट
वार्ड में भर्ती मरीज हो रहे परेशान
उरई। पटेल नगर निवासी दिलीप दस दिनों से वार्ड दो में भर्ती हैं। उन्होंने बताया कि कर्मचारियों की कमी के चलते कई बार बुलाने पर नर्स देखने आती है। अन्य सुविधाएं भी जैसे तैसे चल रही हैं। दो दिन पहले चलता पंखा गिर गया था। गिरता पंखा पास बैठे दिलीप की पत्नी ने पकड़ लिया था। अगर पत्नी पास न होती तो बड़ा हादसा हो जाता। वार्ड दो में भर्ती कैलिया क्षेत्र के देवगांव निवासी विनोद ने बताया कि बुलाने पर भी कर्मचारी नहीं आते हैं। अक्सर बिजली भी गुल रहती है। इस संबंध में प्रभारी प्राचार्य शैलेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि कर्मचारियों की कमी तो हैं। जो स्टाफ है उसी से काम चला रहे हैं प्रयास यही है कि किसी मरीज को दिक्कत न हो। शासन को लिखा पढ़ी भी की गई है।