भागवत कथा कहते बाल शुक पुंडरीक कृष्ण
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ग्राम नरी में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के दौरान व्यासपीठ के 12 वर्षीय पं. पुंडरीक कृष्ण महाराज श्रीधाम वृंदावन ने कहा कि परमात्मा परीक्षा का नहीं विश्वास का विषय है। परमात्मा चरणों में समर्पित निश्छल भक्ति ही परम कल्याणकारी है। आदिशक्ति सतीजी ने भी परमात्मा की परीक्षा लेने की भूल की और उन्हें अपना अस्तित्व गंवाना पड़ा।
व्यास जी ने कहा कि दक्ष प्रजापति ने कनखल क्षेत्र में यज्ञ आरंभ किया और दुराग्रह पूर्वक कहा कि वह विष्णु की पूजा तो करेंगे लेकिन शिव की नहीं। देवताओं ने भी उन्हें समझाया कि यह यज्ञ बिना शिव पूजा के सफल नहीं होगा। दक्ष ने उनकी बात नहीं सुनी। वहीं देवी सती बिना बुलाए पिता के यज्ञ में शामिल होने पहुंच गईं और शिव का अपमान होता देख उन्होंने
यज्ञकुंड में कूद कर प्राणों की आहुति दे डाली। यज्ञ का ध्वंस हो गया, कुपित शंकर के शरीर से निकले भैरव ने दक्ष का सिर काट उनका मान मर्दन किया। इस प्रकार धर्मार्थ यज्ञ अधर्म में परिवर्तित होकर असफल हो गया। कहा कि प्रभु चरणों में अनुराग और निष्ठा के ही प्रभाव से प्रह्लाद जैसे भक्त के कष्ट दूर करने भगवान स्तम्भ से प्रकट हुए। प्रह्लाद के पिता अत्याचारी
हिरण्यकश्यप का वध किया और उसे मोक्ष प्रदान किया। दैत्यों का राजा बलि एक महान दानवीर था किंतु उसे इसका भी अभिमान हो गया। इस पर भगवान नारायण ने वामन अवतार
धर बलि का दंभ चूर किया। बली के तीसरा पग अपने सिर पर रखने को कहने से प्रसन्न भगवान नारायण इतना प्रसन्न हुए कि उसे भी मोक्ष धाम दिया। कथा व्यास के अनुसार व्यक्ति को दान करते समय अहंकार का भाव नहीं रखना चाहिए।