मुहम्मदाबाद (जालौन)। बुंदेलखंड के किसानों का अब पारंपरिक खेती छोड़कर फूलों और फलों की खेती की ओर भी रुझान बढ़ रहा है। उनका कहना है कि कम लागत में ज्यादा मुनाफा मिलता है। साथ ही अन्ना मवेशियों और सिंचाई की समस्या का भी कोई झंझट नहीं है।
ब्लाक के खरका गांव के प्रगतिशील किसान मानसिंह ने रेड लेडी 786 वैराइटी के ताइवानी पपीते की खेती की है। मानसिंह के मुताबिक, यह फसल सात माह में तैयार हो जाती है। साथ ही 11 माह में फल मिलने लगते हैं। बताया कि यह बीज उन्होंने लखनऊ से 3850 रुपये का दस ग्राम के हिसाब से मंगाया है। इसके दस ग्राम में करीब 600 दाने होते है। इसमें पांच सौ पौध तैयार हो जाती है। एक एकड़ में एक हजार पौध लगाई जाती है।
उन्होंने दो एकड़ में दो हजार पौध लगाए हैं। बताया कि यह पपीता खाने में स्वादिष्ट और मीठा होता है। इस खेती में खासियत यह है कि किसी भी पौधे का नुकसान नहीं होता है। सभी पौधे फल देते है। उन्होंने बताया कि अभी शुरुआत में उन्होंने 3500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब 70 क्विंटल पपीता बेचा है। उन्हें उम्मीद है कि उनके खेत में पांच सौ क्विंटल पैदावार होगी। ताइवान के पपीते के अलावा थाइलैंड का एपिल बेर के भी पौधे लगाए हैं। बताया कि 35 रुपये प्रति पौध की दर से सौ ंपौधे लाए हैं। बेर की खासियत है कि यह 80 ग्राम से लेकर 150 ग्राम तक का होता है।
इसमें विटामिन भी भरपूर पाया जाता है। आसपास के गांवों के कई किसान भी उनसे बेर और पीपते की पैदावार के बारे में जानकारी लेकर मुनाफा कमा रहे हैं। पपीते में पानी ड्रिप के माध्यम से दिया जाता है, जबकि बेर में भी एक बार पानी देने के बाद महीनों की फर्सत हो जाती है। इस खेती में अन्ना मवेशियों का भी डर न के बराबर रहता है। बकौल मानसिंह कृषि उत्पादन आयुक्त रहे आलोक रंजन ने उन्हें फूलों की खेती के लिए सम्मानित किया है। इसके अलावा डीएम डॉ मन्नान अख्तर, उद्यान अधिकारी और कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही के हाथों भी सम्मानित हो चुके हैं।