मुहम्मदाबाद। मोहर्रम पर बनने वाले ताजिया का काम इस समय जोरों पर है। गांव में निकलने वाले ताजियों को कारीगर अंतिम रुप देने में लगे है। 15 फुट ऊंचे ताजिये का निर्माण कार्य गांव के इमामबाड़े में पिछले एक माह से चल रहा है। जिसको बहुत ही आकर्षक रुप देने में कारीगर दिन रात जुटे हैं। इस बार सामाजिक दूरी के नियम के तहत ताजियों की लंबाई कम कर दी गई है।
मुहम्मदाबाद गांव में मोहर्रम पर निकलने वाला बड़ा ताजिया इस बार लगभग 15 फीट का बनाया जा रहा है। एक माह से झांसी जनपद के लुहारी गांव के कारीगर करीम उल्ला शाह अपने बेटे अनीस शाह व अन्य कारीगरों की मदद से ताजिया बनाने में जुटे है। उन्होंने बताया कि इस बार ताजिया में इमाम हुसैन का रोजा कांच और जरकिन का बनाया जा रहा है। वहीं ऊपर हिस्से में मुहम्मद साहब का रोजा व खजूर बनाया है। उसके आसपास हाजी अली और बाबा शरीफ अली व फातिमा का रोजा बनाया है। मोहर्रम की सात तारीख 27 अगस्त को मेहंदी निकाली जाएगी। नौ तारीख यानी 29 अगस्त की रात ताजिया निकाला जाएगा। जबकि 30 अगस्त को दिन में ताजिया निकाला जाएगा।
महंगाई की वजह से बढ़ गई ताजिया की लागत
मुहम्मदाबाद गांव में हिंदू मुस्लिमों के सहयोग से बनने वाला ताजिया बनाने वाले कारीगर थर्माकोल, कांच, जरकिन, पन्नी, बांस, सुतली, फेबिकॉल, कील, रंगीन गेंद आदि का प्रयोग करते हैं। ताजिया बनाने आए कारीगर करीम उल्ला ने बताया कि इस बार बनने वाले ताजिये में लगभग दो से ढाई लाख रुपये का खर्च आएगा। निर्माण सामग्री महंगी होने की वजह से लागत बढ़ गई है। वहीं सामान भी इस बार मन मुताबिक नहीं मिला है। फिर भी ताजिए को भव्य रुप देने की पूरी कोशिश की गई है। उनका कहना है कि तो सिर्फ मजदूरी लेकर ही इस काम को करते हैं। ताजिया बनने के बाद इसमें बिजली के उपकरणों से सजावट करेंगे।
इमाम हुसैन की शहादत को याद कर मनाते हैं मोहर्रम
मोहर्रम इस्लामी महीना है। इससे इस्लाम धर्म के नए साल की शुरूआत होती है। लोगों में मान्यता है कि इस महीने की दस तारीख को इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। इसलिए इस दिन को रोजा ए अशुरा भी कहते हैं। मोहर्रम का यह दिन अहम माना गया है। मोहर्रम के दसवें दिन इस्लाम की रक्षा के लिए हजरत इमाम हुसैन ने अपने प्राण त्याग दिए थे। उन्हीं की याद में ताजिया व जुलूस निकाला जाता है।
शासन की गाइडलाइन का होगा पालन
ताजिया कमेटी के अध्यक्ष राशिद खान एवं हैदर बेग ने बताया कि इस वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते ताजिया की लंबाई कम की गई है। ताकि ताजिया निकालते समय दिक्कत न हो और शासन की गाइडलाइन का पालन हो सके।
चार पवित्र महीने में शुमार है यह माह
सरावन। मौलाना महबूब आलम कहते है कि इस्लामी वर्ष यानी हिजरी वर्ष का पहला महीना है। इसे इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद ने इस मास को अल्लाह का महीना कहा है। इसमें रोजा रखने की खास अहमियत बयान की है। हजरत मुहम्मद के कथन व अमल से मुहर्रम की अहमियत का पता चलता है। इस माह में अल्लाह की इबादत करनी चाहिए। मोहर्रम की 9 तारीख को जाने वाली इबादतों का भी बड़ा सवाब बताया गया है। जिसने नौंवी तारीख का रोजा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ हो जाते हैं तथा मुहर्रम के एक रोजे का सवाब 30 रोजों के बराबर मिलता है। यह रोजे अनिवार्य नहीं हैं पर मुहर्रम के रोजों का बहुत सवाब है। कहा जाता है कि इस दिन अल्लाह के नबी हजरत नूहकी किश्ती को किनारा मिला था। इसके साथ ही आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को इराक स्थित कर्बला में हुई यह घटना सत्य के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है। इस घटना में हजरत मुहम्मद के नवासे हजरत हुसैन को शहीद कर दिया गया था। बुजुर्ग कहते हैं कि इसे याद करते हुए भी हमें हजरत मुहम्मद का तरीका अपनाना चाहिए। इस दिन मुसलमान इमामबाड़ों में जाकर मातम मनाते हैं और ताजिया निकालते हैं।
मुहम्मदाबाद स्थित इमामबाड़े में बना ताजिया दिखाता कारीगर- फोटो : ORAI
ताजिया बनाने के काम में जुटे बच्चे- फोटो : ORAI