कोंच (जालौन)। सपा कार्यकर्ताओं में पार्टी के इस बयान से मायूसी छा गई है कि महापौर एवं नगर निगम पार्षदों को ही पार्टी सिंबल पर चुनाव लड़ाया जाएगा, नगर पालिका और नगर पंचायत पर नहीं। राजनीति के जानकारों का कहना मानना है कि जिस तरह से बसपा विधान सभा चुनाव के डर से निकाय चुनाव से भागी थी, ठीक उसी तरह सपा भी लोकसभा चुनाव के डर से निकाय चुनाव पार्टी सिंबल से लड़ाने से कतरा रही है।
निकाय चुनाव को लेकर सख्त कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में सरकार जल्दी से जल्दी आरक्षण प्रक्रिया पूरी करने में लगी जरूर है और उसकी कोशिश है कि नियत समय के भीतर सभी जरूरी औपचारिकतायें निपटा कर समय से चुनाव करा सके, लेकिन इसी बीच अचानक सपा की ओर से आये इस बयान ने सपा की साख को कुछ कमजोर सा किया है। पार्टी की ओर से आये इस बयान का सीधा असर तो पार्टी कार्यकर्ताओं पर ही पड़ा है, वे कार्यकर्ता कुछ ज्यादा ही निराश हैं जो सालों से चुनाव की तैयारियां कर रहे हैं।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि इस स्थिति में पार्टी कार्यकर्ता मायूस हैं और उनका मनोबल भी गिरा हुआ है। हालांकि नेता ने इस बात से साफ इंकार किया है कि सपा संसदीय चुनावों से डर रही है। उनका कहना है कि सपा को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए।
इधर, आम जनता सपा के इस निर्णय को हास्यास्पद मान रही है, जनता का दो टूक कहना है कि शायद सपा को खुद पर ही भरोसा नहीं रह गया है तभी तो उसने ऐसा बयान दिया है। अधिवक्ता लालजी सिंह गुर्जर, अवकाश प्राप्त प्राचार्य प्रोफेसर वीरेन्द्र सिंह, डॉ. दिनेश उदैनिया आदि ने कहा कि सपा ने खेल शुरू होने से पहले ही निकाय चुनाव में अपनी हार स्वीकार कर ली है। सपा शायद इस बात को लेकर पसोपेश में है कि अगले दो साल के दरम्यान संसदीय चुनाव होने हैं और अगर निकाय चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो लोस चुनावों पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।