उरई(जालौन)। हिंदी दिवस के अवसर पर कल्याणी महिला विकास संस्थान एवं हिंदी साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में वर्तमान समय में हिंदी भाषियों की उदारता की आवश्यकता है विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में कहा गया कि आज के इस दौर में लोग शुद्ध हिंदी कम बोल पा रहे हैं। कन्याकुमारी से लेकर काश्मीर तक हिंदी भाषा का लोगों को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है। हिंदी सर्व स्वीकार भाषा है, लेकिन इसे बदलने के जतन किए गए हैं, जिनसे हमें सचेत रहना होगा और अशुद्ध बोलने पर चिंतन करना होगा।
मंगलम हाउस में आयोजित गोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि डीएम रामगणेश ने किया। उन्होंने कहा कि भौतिक वाद की ओर लोग भाग रहे हैं, लेकिन हिंदी में वह क्षमता है कि लोगों को मानवतावाद की ओर मोड़ सकती है। उन्होंने कहा कि हिंदी शब्दों का सही उच्चारण करना चाहिए। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक अपने दायित्वों का निर्वाहन ठीक ढंग से करें, जिससे हिंदी भाषा की शुद्धता पर आंच ना आ सके। विशिष्ट अतिथि एसपी राकेश शंकर ने कहा कि हिंदी भाषा हमारी राष्ट्र भाषा है और इसमें वह क्षमता है कि कन्याकुमारी से लेकर काश्मीर तक लोगों को एक सूत्र में पिरोती है। वरिष्ठ स्तंभकार केपी सिंह ने कहा कि बाजार पूंजीवादी हितों के लिए हिंदी को अपने तरह से इस्तेमाल करने का प्रयास कर रहा है, जिसे किसी भी कीमत पर पूरा नहीं होने दिया जाएगा। गोष्ठी में डॉ. कुमारेंद्र सिंह सेंगर ने कहा कि आज के इस दौर में लोग शुद्ध हिंदी नहीं बोलते हैं, इसके लिए चिंतन करने की आवश्यकता है। आम बोलचाल हो या फिर लेखन कार्य में मात्राओं विसर्ग का सही प्रयोग नहीं करते हैं। हिंदी के प्रति चिंतन के साथ जागरुकता की भी आवश्यकता है। डॉ. हरिमोहन पुरवार ने कहा कि हिंदी सर्व स्वीकार हो रही है। बाजार भी इसे स्वीकारता दे रहा है। गोष्ठी की अध्यक्षता साहित्यकार यज्ञदत्त त्रिपाठी ने की व संचालन सुभाष चंद्र ने किया। इस मौके पर रविकांत द्विवेदी, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रामकुमार दीवौलिया, आदित्य कुमार, प्रोफेसर राकेश नारायण द्विवेदी, अलका रानी, डा. जय श्री पुरवार, धर्मनाथ प्रसाद, डॉ. वीणा श्रीवास्तव, अरुणा सक्सेना आदि मौजूद रहे।
कोंच के साहित्यकारों ने पुष्ट किया हिंदी को
कोंच। हिंदी को पुष्ट करने में कवियों और साहित्यकारों की अहम भूमिका रही है। खासतौर पर साठ के दशक में जब हिंदी संक्रमण के दौर से गुजर रही थी, तब तत्कालीन कवियों ने हिंदी को अपनी साहित्य विधा के रूप में अपना कर हिंदी को पुष्ट करने में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाई। साठ के दशक के कवियों की अगर बात करें तो कोंच में प्रभुदयाल द्विवेदी ‘दयालु’, चतुर्भुज वैद्य, रामकृष्ण राजौरिया ‘मस्त’, कालकाप्रसाद हिंगवासिया ‘भूषण’, अवधविहारी लोहिया ‘कण’, रामरूप स्वर्णकार ‘पंकज’, ब्रजभूषणदास महंत ‘पुष्प’, भगवानदास शुक्ला ‘दास’, कालीचरण बसेड़िया ‘कांत’, रामगोपाल राजौरिया ‘भ्रंग’ जैसे कई नामचीन चेहरे हैं, जिन्होंने हिंदी में उत्कृष्ट रचनायें गढ़ी और तत्कालीन परिस्थितियों को उनमें बखूबी उकेरा।
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