उरई (जालौन)। खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए करोड़ों की लागत से बना इंदिरा स्टेडियम पूरी तरह बेमकसद साबित हो रहा है। तकरीबन एक वर्ष से स्टेडियम में न तो कोई खेल प्रतियोगिता हुई और नहीं मैदान में खिलाड़ी खेलते नजर आते हैं। स्टेडियम का गेट पूरे दिन बंद रहता है, अधिकारियों के कमरे में भी ताले लटकते रहते हैं। हाल ही में स्टेडियम का तरणताल शुरू किया गया, लेकिन तरणताल की फर्श इतनी खराब है कि खिलाड़ी उसमें छलांग लगाने से भी कतराते है। मजे की बात यह है कि स्टेडियम का हाल जानने के लिए अरसे से किसी आला अफसर ने निरीक्षण तक नहीं किया।
इंदिरा स्टेडियम वर्ष 1989 में बनकर तैयार हुआ है। स्टेडियम में कोच है, खेल का सामान भी है, लेकिन यहां खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने वाली खेल प्रतियोगिताएं होती नहीं दिखती। माधौगढ़ के बीहड़ क्षेत्र के तेज प्रताप राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जिमनास्टिक प्रतिभा का लोहा मनवा चुका है, इन्हें अपवाद के नाम पर छोड़ दिया जाए तो ऐसा कोई भी खिलाड़ी नहीं निकला, जिसने अपने हुनर का लोहा मनवाया हो। स्टेडियम में स्थित ट्रैक एंड फील्ड गड्ढों में तब्दील होती जा रही है। हाकी व फुटबाल की गोल पॉस्त अरसे से टूटे पड़े हैं, क्रिकेटरों के लिए मैदान तो है लेकिन पिच नदारद है।
तरणताल की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। 86 लाख की लागत से बना यह तरण ताल अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। हाल ही में तरण ताल ठीक करने के लिए दस लाख रुपये और खर्च हो गए लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। तरणताल की फर्श इस कदर खराब है कि तैराक उसमें छलांग लगाने से कन्नी काटते हैं। इसी तरह व्यायाम के लिए बनाए गए जिम की मशीनें जंग खा रही है। इसके अलावा दर्शक दीर्घा भी जगह जगह से टूटी पड़ी है।