जालौन जिले के कोंच कस्बे में धूप से बचने के लिए गमछा ओढ़े खड़े मतदाता।
- फोटो : amar ujala
बता दें कि इस बार अप्रैल माह की शुरूआत से ही भीषण गर्मी ने अपना रुप दिखाना शुरू कर दिया था। जिसे देखते हुए प्रशासन ने 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए काफी तैयारी कर रखी थी। बड़ों से लगाकर स्कूली बच्चों तक को मतदाता जागरुकता में लगाया गया था। सरकारी दफ्तर रहा हो या प्राइवेट आफिस सभी जगह मतदाता जागरुकता के पर्चे बांटे गए और रैलियां भी निकाली गई। इन सबके बाद भी मतदान का प्रतिशत 2014 के चुनाव से अधिक नहीं बल्कि उसके बराबर भी नहीं पहुंच सका।
हालांकि सुबह से ही मतदान केंद्रों में लाइन जरूर लगीं लेकिन कई जगहों जैसे कदौरा, कुठौंद, सरावन, रामपुरा और उरई आदि बूथों पर ईवीएम की खराबी से लोग वोट नहीं डाल सके, जिसके चलते कई वोटर बिना वोट डाले ही लौट गए। इसी तरह उरई, सरावन, माधौगढ़, कालपी, कदौरा आदि क्षेत्रों में सैकड़ों मतदाताओं के नाम सूची से नदारद रहे। इतना ही नहीं कई मृतकों के नाम मतदाता सूची में दर्ज थे। इस कारण भी लोगों को वोट डालने से वंचित होना पड़ा। रही सही कसर जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा ने पूरी कर दी।
कदौरा और डकोर के कई गांवों में मतदाताओं ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया। प्रशासन के अधिकारियों की तमाम जद्दोजहद के बाद भी डकोर और कदौरा में छिटपुट वोट ही पड़ सके। जिसे भी मतदान का प्रतिशत गिरने की मुख्य वजह माना जा रहा है। आधिकारिक सूत्रों की मानें तो मतदान का प्रतिशत पिछले चुनाव की तुलना में भी कम रह जाने के कारणों का जल्द पता किया जाएगा और इसके दोषी अधिकारियों व कर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट तैयार शासन को भेजी जाएगी।