उरई। कहते हैं कि अगर समाजसेवा का जुनून दिल में हो तो इंसान किसी भी पद व पेशे में हो, वह अपनी सकारात्मक ऊर्जा से समाज के किसी न किसी वर्ग को लाभ पहुंचाता ही रहता है। कुछ ऐसी ही नजीर उरई स्टेशन पर तैनात मुख्य टिकट निरीक्षक डा. आरके शाक्या ने दी है। वह अपने पद पर की जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने घर से भागे व खोये सैकड़ों बच्चों को न सिर्फ उनके मां बाप से मिलाया, बल्कि जब तक बच्चे के परिजन नहीं मिलते तब तक उनकी देखरेख की जिम्मेदारी भी उठाते हैं।
डा. शाक्या बताते है कि उन्हें गुम हुए बच्चों को उनके घर पहुंचाने की सोच खुद की पीड़ा से मिली। वह बताते है कि उनके नजदीकी रिश्तेदार का बेटा यात्रा के दौरान ट्रेन में बिछड़ गया था, जो आज तक नहीं मिल सका। पूरा परिवार उनके दर्द से जूझ रहा है। उसकी पीड़ा आज भी वह महसूस करते है। तभी से संकल्प लिया था कि इस पीड़ा से वह और किसी को जूझने नहीं देंगे और तब से लेकर अब तक सैकड़ों बच्चों को उनके परिवार से मिलाया, जिससे उन्हें बेहद सुकून मिलता है।
डा. शाक्या बताते है उनके मन में छात्र जीवन से ही समाजसेवी का भाव था, लेकिन वर्ष 1995 में रेलवे में टिकट निरीक्षक के पद पर नियुक्ति के बाद वह नौकरी में ही व्यस्त रहने लगे थे। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, लेकिन मन में समाज के लिए कुछ न कर पाने की टीस उन्हें हमेशा खलती थी। एक दिन अपने रिश्तेदार के गुम हुए बच्चे की पीड़ा को देख उनके मन में बिछड़े, अगवा व घर से भागे बच्चों को उनके घर पहुंचाने की अलख जगी।
इसके बाद जब भी टिकट की जांच के दौरान संदिग्ध लग रहे बच्चों से पूछताछ में पता चलता कि वह बिछड़ गए हैं या फिर घर से भागे हैं। तो बच्चों को समझाकर घर पहुंचाने लगे। धीरे-धीरे उनकी इस मुहिम में सैकड़ों लोग जुड़ने लगे और झांसी कानपुर के बीच किसी को भी कोई गुमशुदा बच्चा मिलता था तो वो उरई स्टेशन में भेज देता था। 1995-2000 तक मोबाइल क्रांति न होने से बच्चों को घर पहुंचाने में काफी दिक्कतें आती थी। वह बताते हैं कि उस समय कई महीनों तक बच्चों को उनके माता पिता का पता नहीं चल पाता था, तब तक वह बच्चों को अपने घर पर ही रखते थे।
मुख्य टिकट निरीक्षक को इस नई पहल ने जल्द ही उन्होंने चर्चाओं में ला दिया। जिससे कई बड़े मंचों में उन्हें समाजसेवा के लिए सम्मानित किया जा चुका है। मुख्य टिकट निरीक्षक का समाजसेवा का जुनून यही तक सीमित नहीं रहा, बच्चों को उनके घर पहुंचाने के साथ-साथ उन्होंने हर वर्ष एक गरीब बेटी की शादी का संकल्प लिया और हर वर्ष एक गरीब लड़की के हाथ पीले करते हैं। अब तक करीब 13 कन्याओं के हाथ पीले करवा चुके हैं।