उरई। विद्यादान करने वालों को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, इनमें शहर के दीपेश व्यास भी ऐसे ही हैं, जो पिछले 11 सालों से कूड़ा बीनने वाले बच्चों को उनके मोहल्ले में जाकर नियमित शिक्षा देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं बच्चों के लिए कापी, पेन, पेंसिल का इंतजाम भी खुद ही करते हैं। जिन बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था, उनकी आज पढ़ाई के प्रति रुचि देखने लायक है।
शहर के मोहल्ला रामनगर निवासी दीपेश व्यास एक निजी डिग्री कालेज में शिक्षण कार्य करते हैं। पढ़ाई का क्या महत्व होता है, वे भलीभांति जानते है। उनका परिवार भी पढ़ा लिखा है। उन्हें शुरू से ही शिक्षण कार्य के प्रति जुनून था, गरीब बच्चों को स्कूल न जाते देख उन्हें कष्ट होता था।
वे बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान एनएसएस के शिविर के दौरान जब वे घर-घर जाकर सर्वे के लिए जाते थे, तो बच्चों को पढ़ाई से दूर कूड़ा बीनते देखकर दुख होता था। उन्होंने तय कर लिया कि बच्चों को नियमित पढ़ाएंगे। इसके चलते वे रोजाना रामकुंड के पास जाने लगे, जहां करीब एक सैकड़ा परिवार रहते है, उनके बच्चे कूड़ा बीनने का काम करते हैं। वे उन्हें रोजाना समझा बुझाकर पढ़ाने लगे। उनकी ललक देखकर एक ठेकेदार ने अपना आवास यह कहकर दे दिया कि अब यहां बैठकर बच्चों को पढ़ाएंगे। अब यहां रोजाना करीब पचास बच्चे पढ़ने आते हैं।
पांच बजे स्कूल की ओर दौड़ लगाते हैं बच्चे
उरई। रामकुंड के पास झारखंड के कई जिलों के लोग रहते है। उनके बच्चे कबाड़ बीनकर बेचने का धंधा करते हैं। जैसे ही पांच बजते हैं, ये बच्चे स्कूल के लिए दौड़ लगाते हैं। अनारुल, शहीद, आलम, इंताजुल आदि के अभिभावक बताते है कि पांच बजते ही ये बच्चे कबाड़ छोड़कर स्कूल की तरफ बैग लेकर भागते हैं।