करबन नदी को स्वच्छ करने के लिए चल रही युवाओं की मुहिम को अब स्थानीय लोगों का सहयोग मिल रहा है। सोमवार को सामाजिक संस्था एकमतेज फाउंडेशन ने जेसीबी मशीन उपलब्ध कराई। जिसकी मदद से सुबह सात बजे से दोपहर एक बजे तक चली सफाई में कंटीली झाड़ियों, गंदगी और कूड़ा-करकट को हटाया गया।
सफाई के दौरान नदी के आसपास के क्षेत्र को व्यवस्थित करने का भी प्रयास किया गया, ताकि भविष्य में यहां गंदगी न फैले और लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़े। युवा चार दिन से इस सफाई में जुटे हैं।
मुहिम का नेतृत्व कर रहे अजरूद्दीन व निर्भय भट्ट ने बताया कि उनकी टीम प्रतिदिन दो से तीन घंटे तक नदी की सफाई में जुटी रहती है। अभी तक जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की ओर से इस अभियान को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया है। इस दौरान धर्मवीर सिंह, ओमवीर सिंह, कन्हैया लाल, हेमंत कश्यप, फौजी कुमार, रोहित चौधरी, दीपक चौधरी, गौरव टेनुआ, विष्णु गंधार, अभिषेक चौधरी, हरेश चौधरी, कृष्ण तिवारी, अमन चौधरी, अन्नू पंडित और पवन चौधरी मौजूद रहे।
एकमतेज फाउंडेशन के अध्यक्ष तेजवीर सिंह ने कहा कि युवा पर्यावरण को लेकर जागरूक हो रहे हैं। नदी को बचाने की यह पहल सराहनीय है। नदी पूरी तरह स्वच्छ हो जाए तो इसका सीधा लाभ क्षेत्र के किसानों और आम लोगों को मिलेगा।
नदी में बहता था अपर गंग नहर का स्वच्छ जल
सादाबाद। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रमुख नदियों में शुमार करबन आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कभी स्वच्छ गंगा जल से भरपूर रहने वाली यह नदी अब शहरों के गंदे नालों और फैक्टरियों के अपशिष्ट की मार झेलते हुए प्रदूषण का शिकार है। नदी में काला पानी, झाग और कीचड़ दिखता है। जागरूक युवाओं द्वारा इसे बचाने के लिए शुरू की गई मुहिम नई उम्मीद जगा रही है।
इस नदी का उद्गम गौतम बुद्ध नगर है। खुर्जा से निकलकर बुलंदशहर, अलीगढ़ की खैर और इगलास तहसीलों से होती हुई सादाबाद पहुंचती है। आगरा जनपद की एत्मादपुर तहसील से गुजरते हुए शाहदरा क्षेत्र में जाकर यमुना नदी में मिल जाती है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पहले करबन नदी में खुर्जा के अपर गंग नहर का स्वच्छ गंगा जल आता था। वर्षा ऋतु में नदी पूरे वेग से बहती थी। गर्मी में भी इसमें पर्याप्त पानी बना रहता था। किसान इसी पानी से खेतों की सिंचाई करते थे और पशुओं के लिए भी यही जल उपयोगी था। नदी किनारे बसे गांवों में भूगर्भ जलस्तर काफी ऊंचा रहता था, जिससे हैंडपंप और कुओं में सालभर पानी उपलब्ध रहता था। स्थानीय लोगों का कहना है कि नदी की धारा को रोकने के लिए जगह-जगह बनाए गए चेकडैम भी समस्या का कारण बने। इन चेकडैमों के पास भारी मात्रा में सिल्ट जमा हो गई, जिससे नदी की जलधारा प्रभावित हुई और उसका प्राकृतिक प्रवाह कमजोर पड़ गया।