स्कूली वैन में बैठे बच्चे
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स्कूलों ने झाड़ा पल्ला, विभाग की भी नजर नहीं
हैरानी की बात यह है कि कई निजी स्कूलों ने ट्रांसपोर्ट व्यवस्था से पूरी तरह पल्ला झाड़ रखा है। स्कूल प्रबंधन का तर्क होता है कि वाहन निजी हैं और अभिभावकों ने स्वयं अनुबंधित किए हैं। परिवहन विभाग की कार्रवाई भी केवल 'पीले रंग' वाले पंजीकृत स्कूली वाहनों तक ही सीमित नजर आती है। विभाग अक्सर केवल आधिकारिक स्कूली बसों की जांच कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है, जबकि बिना परमिट और बिना सुरक्षा मानकों के चल रही डग्गामार वैन पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं है।
फर्जी बीमा का चल रहा खेल
स्कूली वाहनों की छानबीन में सामने आया कि जिले में फर्जी बीमा का भी खेल चल रहा है। मिली जानकारी के अनुसार ये वाहन स्वामी फिटनेस व परमिट के समय सेटिंग के आधार पर एक दो-दो दिन या माह का बीमा करा लेते हैं। इंश्योरेंस एजेंट की सांठ-गांठ से ऐसा होता है। इसके बाद पोर्टल पर गाड़ी का बीमा दिखने लगता है। पूरे बीमे की कीमत से 10 फीसद कीमत में ही काम हो जाता है।
स्कूल वाहनों के लिए नियम
- वाहन की पहचान और बाहरी बनावट से नजर आना चाहिए कि यह स्कूल बस है, जैसे सुनहरा पीला रंग, स्कूल वाहन लिखना, संपर्क विवरण, खिड़कियों पर ग्रिल आदि।
- बस में स्पीड गवर्नर, जीपीएस व कैमरे व पैनिक बटन होने चाहिए।
- कैमरे की 60 दिनों की रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखना आवश्यक है।
- बस के पीछे या दाईं ओर एक आपातकालीन द्वारा होना चाहिए।
- बस में अग्निशमक यंत्र और सुसज्जित फर्स्ट-एड बॉक्स आवश्यक है।
- चालक और परिचालक को निर्धारित वर्दी पहनना अनिवार्य है।
- चालक का पिछले एक साल में ओवर स्पीडिंग या खतरनाक ड्राइविंग के लिए चालान हुआ है, तो उसे नियुक्त नहीं किया जा सकता।