दाऊजी मंदिर के गुंबद पर बने तोप के गोलों के निशान। संवाद
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आज हम सभी देश की आजादी का जश्न मना रहे हैं। ऐसे में फिर एक बार आजादी की चर्चित कहानियों को याद किया जा रहा है। हाथरस शहर में भी आजादी के निशान अभी भी मौजूद हैं। राजा दयाराम किला परिसर के दाऊजी मंदिर की प्राचीर पर आज भी अंग्रेजों की तोप के गोलों के निशान शेष हैं, जो आजादी की जंग में क्रांतिकारियों के बलिदान की याद दिलाते हैं।
सन् 1857 में स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत हुई थी, लेकिन इससे 40 वर्ष पहले ही हाथरस में अंग्रेजों से जंग लड़ी गई। जानकारों का कहना है कि 17वीं शताब्दी में यहां राजा भूरी सिंह का शासन था। उन्होंने किला परिसर में मंदिर श्रीदाऊजी महाराज की स्थापना कराई थी। उनके बाद उनके बेटे राजा दयाराम ने सत्ता संभाली। अंग्रेज उस समय अपना साम्राज्य फैला रहे थे।
उनकी नजर हाथरस पर भी पड़ी। अंग्रेजों ने राजा दयाराम से आत्मसमर्पण करने के लिए कहा, लेकिन राजा ने ऐसा नहीं किया और अंग्रेजों का मुकाबला किया। राजा दयाराम और अंग्रेजी फौज में मार्च 1817 को भीषण जंग हुई। तीन दिन तक चले इस युद्ध में राजा दयाराम के तोपखाने में आग लग गई। पूरा किला तहस-नहस हो गया।
उसके बाद एक गुप्त रास्ते से राजा दयाराम यहां से चले गए और यहां अंग्रेजों का शासन हो गया। जानकार बताते हैं कि राजा दयाराम एक सुरंग के रास्ते से निकले तो किला परिसर के निकट इस गांव का नाम इसी वजह से सुरंगपुरा पड़ गया। अंग्रेजों द्वारा दागे गए गोले में से एक गोला अभी भी मंदिर में मौजूद है। वहीं मंदिर के गुंबद पर तोप के गोलों के निशान आज भी देखे जा सकते हैं।