विनीत चौरसिया
हाथरस। ब्रज क्षेत्र के मशहूर लक्खी मेला श्री दाऊजी महाराज में आयोजित होने वाले अखिल भारतीय बुर्ज कुश्ती दंगल का गौरवशाली इतिहास रहा है। वर्तमान में दंगल में भले ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के नामचीन पहलवान दमखम दिखाते हों, लेकिन पुराने दौर में भी इसका रोमांच कम नहीं था। करीब 38 साल पहले दंगल को देखने के लिए पांच से 50 पैसे का टिकट भी लगता था।
कुश्ती प्रेमी बाकायदा टिकट खरीदकर दंगल का लुत्फ उठाते थे। पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित क्षेत्र में आज भी उस दौर के दंगल प्रांगण के मुख्य प्रवेश द्वार और उसके पास बनी टिकट खिड़की के अवशेष ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मौजूद हैं।
शहर के पुराने कुश्ती प्रेमी प्रेम गुरु बताते हैं कि शुरुआत में महज पांच पैसे के टिकट से दंगल की शुरुआत हुई थी, जिसके बाद टिकट का रेट 50 पैसे तक पहुंचा था। उस समय दंगल स्थल को चारों तरफ से लगभग 12 फुट ऊंची टिन की चादरों से घेरकर कवर किया जाता था, ताकि बिना टिकट कोई प्रवेश न कर सके। उस दौर में भी कुश्ती के प्रति लोगों में इस कदर दीवानगी थी कि रोजाना दो हजार से अधिक दर्शक 50 पैसे का टिकट खरीदकर कुश्तियां देखने पहुंचते थे। मंदिर परिसर के पास मौजूद दंगल द्वार के अवशेष आज भी हाथरस की इस समृद्ध कुश्ती परंपरा और ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत की गवाही देते हैं। संवाद
जीते पहलवानों को सम्मानित करते थे चंबल के डाकू
राजा दयाराम किला परिसर में 80 साल तक सफाई का काम करने वाले दिवंगत चंद्रभान सिंह के नाती सुबोध कुमार ने बताया कि उनके दादाजी इस बारे में उन्हें बताया करते थे कि चंबल के डाकू मोहर सिंह व माधव सिंह दो चांदी से जड़े सींगों वाली गायें लेकर यहां आते थे। जीतने वाले पहलवानों को सम्मानित करते हुए ये गायें उन्हें उपहार स्वरूप दी जाती थीं। सुबोध कुमार बताते हैं कि उनके दादाजी हमेशा इस मेले के अपने अनुभव उनके साथ साझा करते थे। उन्होंने बताया था कि उस समय भी हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, पंजाब व बिहार तक के पहलवान यहां दांव आजमाने आते थे। उस समय चंदगीराम पहलवान, शिवाले पहलवान और मोहन पहलवान आदि की कुश्तियां काफी नामी हुआ करती थीं। एक बार प्रसिद्ध फिल्म कलाकार दारा सिंह के छोटे भाई भी इस पुराने अखाड़े पर आए थे।