तमाम कोशिशों के बावजूद कई गर्भवती महिलाएं बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाती हैं। सरकार की कोशिश है कि गांव में ही कैंप लगाकर इन महिलाओं का पंजीकरण किया जाए और वहीं खून, पेशाब आदि की जांच कर गर्भ की जटिलताओं का पता लगा लिया जाए, जिससे समय रहते उपचार कर शिशु और मां दोनों की जान बचाई जा सके। 27 जनवरी से तीन फरवरी तक स्वास्थ्य विभाग मातृत्व सुरक्षा सप्ताह का आयोजन कर रहा है। इस सप्ताह के तहत गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण किया जाना है।
अपर मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. संतोष कुमार के मुताबिक मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए कुपोषण से बचाव एवं समुचित पोषण अत्यंत आवश्यक है। गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला को देखभाल की अधिक जरूरत होती है, क्योंकि कुपोषण की शुरुआत मां के गर्भ से ही हो जाती है। बाल्यकाल में होने वाले 50 प्रतिशत कुपोषण का संबंध गर्भावस्था के दौरान मातृ स्वास्थ्य संबंधी कारकों से जुड़ा होता है। जिले में 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी पाई जाती है, जो अत्यधिक मातृ मृत्यु दर का कारण भी है। हर महीने गांव स्तर पर होने वाले ग्राम स्वास्थ्य पोषण दिवसों के दौरान गर्भवती महिलाओं के खून व पेशाब की जांच, ब्लड प्रेशर और गर्भ की जांच होनी आवश्यक है। इससे समय रहते जटिलताओं का पता लगाया जा सकेगा और गर्भस्थ शिशु की जान बचाई जा सकेगी।
(यूनीसेफर के रैपिड सर्वे ऑफ चिल्ड्रेन के मुताबिक )- यूपी में 40 फीसदी गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण नहीं हो पाता- 30 फीसदी गर्भवती महिलाओं की चार या इससे अधिक जांचे हो पाती हैं- आठ फीसदी को ही 100 या इससे अधिका आयरन की गोलियां प्राप्त हो पाती हैं- पांच फीसदी ही 100 या इससे अधिक आयरन की गोलियां खा पाती हैं - केवल तीन फीसदी महिलाएं ही प्रसव पूर्व सभी सेवाएं प्राप्त कर पाती हैं।
- प्रदेश में अति कुपोषित बच्चों की संख्या 13 लाख से ज्यादा है, जिले में यह आंकड़ा 10759 है।
मातृत्व सप्ताह का उद्देश्य- गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण कराना- उनके पोषण एवं स्वास्थ्य की जांच करना- जटिलताओं से ग्रसित महिलाओं की पहचान कर उन्हें उपचार दिलाना- संस्थागत प्रसव में वृद्धि करना