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बंदरों का खौफ : हादसों के बाद भी नहीं टूट रही नींद

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मंडी समिति परिसर में घूमते बंदरों के झुंड।  संवाद - फोटो : Samvad
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शहर और आसपास के इलाकों में बंदरों का खौफ बढ़ता ही जा रहा है, जिससे आम जनता का जीना मुहाल हो चुका है। बंदर लगातार हमले कर रहे हैं, जिसमें लोग जख्मी हो रहे हैं। निजी और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंच रहा है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की नींद नहीं टूट रही है। शासन स्तर से दो महीने पहले जारी हुए आदेशों को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। न ही बंदरों के स्थान चिह्नित हुए हैं और न ही गिनती शुरू हो सकी है।
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बंदरों के खौफ के कारण शहर के कई मोहल्लों के लोग अपने ही घरों में कैद हो गए हैं। आलीशान घर अब लोहे के पिंजरों में तब्दील हो चुके हैं। बंदरों को घर के भीतर घुसने से रोकने के लिए लोगों ने छतों, बालकानी और खुले आंगन को महंगे लोहे के जालों से बंद करा दिया है। लोग सुरक्षा के लिए घरों के बाहरी हिस्सों में हल्के करंट वाले तार लगाने के लिए मजबूर हैं। बंदरों के डर से लोग अपनी ही छतों पर जाने से कतराते हैं और गलियों में बच्चों को अकेले भेजने से भी डर रहे हैं।




शासनादेश के दो महीने बाद भी कुछ नहीं किया
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा दो अप्रैल 2026 को मानव-बंदर संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए एक अंतरिम कार्ययोजना लागू की गई है। सभी जिलाधिकारियों को इसके आदेश जारी किए गए। इस कार्ययोजना के तहत सभी नगर निकायों (नगर पालिका, नगर पंचायत) को एक महीने के भीतर अपने क्षेत्रों में बंदरों के स्थान चिह्नित करने थे। इसके साथ ही हेल्पलाइन नंबर जारी करने और बंदरों को पकड़वाने की योजना बनाने का निर्देश दिया गया था। आदेश जारी होने के दो महीने बाद भी हाथरस में स्थिति जस की तस है। धरातल पर न तो अभी तक स्थान चिह्नित किए गए हैं और न ही बंदरों को पकड़ने के लिए कोई टेंडर निकाला गया है। न ही कोई योजना बनाई गई है।
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नियम स्पष्ट, जिम्मेदारी से भाग रहे अफसर
शासन की अंतरिम कार्ययोजना में यह पूरी तरह साफ है कि बंदरों की प्रजाति रीसस मैकाक वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची में शामिल संरक्षित प्रजातियों में नहीं है। इसलिए इस प्रजाति के बंदरों को पकड़ने के लिए वन विभाग से किसी भी प्रकार की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। पकड़ने की जिम्मेदारी स्थानीय शहरी निकायों व ग्राम पंचायतों की है। विधिक अड़चनें खत्म होने के बाद भी हाथरस नगर पालिका और जिला प्रशासन ने इनको पकड़ने का कोई अभियान नहीं चलाया है, जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है।




यह है निगरानी कमेटी

बंदरों को पकड़ने के लिए हर जिले में एक हाई-पावर कमेटी का गठन किया गया है। कमेटी के अध्यक्ष जिलाधिकारी हैं। इनके अलावा कमेटी के सदस्यों में पुलिस आयुक्त द्वारा नामित प्रतिनिधि, प्रभागीय वनाधिकारी, मुख्य पशुचिकित्सा अधिकारी, जिला पंचायतराज अधिकारी, खंड विकास अधिकारी, डीएम द्वारा नामित वन्यजीव विशेषज्ञ एनजीओ, सदस्य-सचिव नगर पालिका परिषद ईओ रहेंगे।

बंदरों के झुंड से हुए हादसे





अस्पताल में अग्निकांड : चार जून को जिला अस्पताल में बंदरों का झुंड बिजली के तारों पर झूला जिससे शॉर्ट सर्किट हो गई। अस्पताल परिसर में भीषण आग लग गई। गनीमत रही कि समय रहते स्थिति पर काबू पा लिया गया, वरना बड़ा हादसा हो सकता था।



छत से गिरकर युवती की मौत : सात अप्रैल को जलेसर रोड स्थित अक्रूर कॉलोनी में 18 वर्षीय शिवानी को बंदरों के झुंड ने छत पर दौड़ा लिया। भागते समय शिवानी का संतुलन बिगड़ गया और वह छत से सीधे नीचे जा गिरी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।






शासनादेश के क्रम में एनिमल कैचर वैन खरीदने की प्रक्रिया चल रही है। टेंडर की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इसके साथ ही प्रशिक्षित स्टाफ की तैनाती की जाएगी।

रोहित सिंह, ईओ नगर पालिका परिषद हाथरस।


शासनादेश में यह हैं कार्ययोजना के बिंदु



-एक महीने में स्थानों की पहचान : सभी नगर निकायों को अपने-अपने क्षेत्रों में बंदरों से अत्यधिक प्रभावित इलाकों और उनकी संख्या का आकलन एक महीने में करना होगा।



-हेल्पलाइन नंबर और नोडल अधिकारी : नागरिकों की शिकायतें और बंदरों के हमले की सूचना दर्ज करने के लिए हर निकाय में एक नोडल अधिकारी तैनात होगा और एक समर्पित हेल्पलाइन नंबर जारी किया जाएगा।
-कूड़ा प्रबंधन और फलदार वृक्षारोपण : शहरों में खाने-पीने के कचरे का त्वरित निस्तारण किया जाएगा ताकि बंदर आकर्षित न हों। इसके साथ ही शहरों के बाहरी हिस्सों और सार्वजनिक क्षेत्रों में फलदार पौधों का सघन रोपण किया जाए।



-संरक्षित क्षेत्रों में नहीं छोड़े जाएंगे बंदर: पकड़े गए बंदरों को उसी जिले के वन्य क्षेत्रों में छोड़ा जाएगा जो मानव आबादी से दूर हों। हालांकि इन्हें किसी भी संरक्षित क्षेत्र जैसे राष्ट्रीय उद्यान या अभ्यारण्य में छोड़ने पर प्रतिबंध रहेगा।
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